हर माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा बड़ा होकर समझदार और आर्थिक रूप से जिम्मेदार बने, लेकिन पैसों की सही समझ सिर्फ बड़े होने के बाद नहीं, बल्कि बचपन से ही विकसित की जा सकती है. अक्सर लोग मानते हैं कि Money Management अमीर परिवारों के बच्चों को ही अच्छी तरह सिखाया जाता है, जबकि सच्चाई यह है कि पैसों की कीमत समझाने का संबंध परिवार की आय से नहीं, बल्कि परवरिश से होता है. 5 साल की उम्र से ही बच्चों को बचत, खर्च और जिम्मेदारी की छोटी-छोटी बातें सिखाई जाएं, तो वे भविष्य में बेहतर फाइनेंशियल फैसले लेना सीख सकते हैं. चलिए आपको बताते हैं ऐसे 3 आसान Money Lessons, जिन्हें हर माता-पिता अपने बच्चे को कम उम्र से सिखा सकते हैं.
फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स और स्टडीज के अनुसार, सात साल की उम्र तक ज्यादातर बच्चे समझ जाते हैं कि पैसा कैसे काम करता है. यह वह समय होता है जब बच्चे आमतौर पर प्राइमरी स्कूल में अपने डेली अलाउंस को संभालना शुरू करते हैं. इसके अलावा इस उम्र तक पैसे के प्रति उनका नजरिया भी बन जाना चाहिए.
बच्चों को उनकी उम्र के हिसाब से जिम्मेदारियां दें
करीब 5 साल की उम्र तक बच्चे घर के कुछ आसान कामों की जिम्मेदारी लेना शुरू कर सकते हैं. जैसे अपना कमरा साफ रखना, कपड़े समेटना, खिलौनों को सही जगह रखना या सुरक्षित तरीके से घर के छोटे-मोटे कामों में मदद करना. माता-पिता चाहें तो इन जिम्मेदारियों को पूरा करने पर बच्चों को थोड़ी जेब खर्च भी दे सकते हैं. उदाहरण के लिए, बच्चा हर हफ्ते कुछ रुपये कमा सकता है. यहां सबसे महत्वपूर्ण बात रकम नहीं, बल्कि मेहनत और इनाम के बीच का संबंध है. इससे बच्चे समझने लगते हैं कि पैसा यूं ही नहीं आता, बल्कि उसे पाने के लिए समय, मेहनत और जिम्मेदारी निभानी पड़ती है. हालांकि, माता-पिता को यह भी समझाना चाहिए कि परिवार का हिस्सा होने के नाते कुछ काम बिना किसी इनाम के भी करने चाहिए. घर में सहयोग करना सभी की जिम्मेदारी होती है और हर मदद के बदले पैसे मिलना जरूरी नहीं है.
पैसों को तीन हिस्सों में बांटना सिखाएं
जब बच्चा थोड़ी-बहुत जेबखर्च पाने लगे, तो माता-पिता उसे पैसों को संभालने का आसान तरीका सिखा सकते हैं. इसके लिए पैसे को तीन हिस्सों में बांटा जा सकता है. जैसे- दान, खर्च और बचत या निवेश. उदाहरण के लिए अगर बच्चे को हर हफ्ते कुछ जेब खर्च मिलती है, तो उसे इस तरह बांटा जा सकता है. जैसे कुछ पैसे दान या दूसरों की मदद के लिए, कुछ पैसे अपनी पसंद की चीजें खरीदने के लिए और कुछ पैसे भविष्य के लिए बचाने के लिए. इन सब के बीच सबसे जरूरी बात यह है कि बच्चा यह आदत सीखे कि मिले हुए सारे पैसे तुरंत खर्च नहीं करने चाहिए.
बच्चों को सिखाएं कि पैसों का एक उद्देश्य होता है
बच्चा हर हफ्ते अपनी जेब खर्च में से थोड़ा-सा पैसा इस गुल्लक या जार में डाल सकता है. महीने के अंत में माता-पिता बच्चे के साथ मिलकर तय कर सकते हैं कि इस पैसे का इस्तेमाल किसी जरूरतमंद की मदद करने या किसी अच्छे काम में कैसे किया जाए. सबसे जरूरी बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में बच्चे को भी शामिल किया जाए. सिर्फ उसकी ओर से दान करने के बजाय, उसे यह फैसला लेने का मौका दें कि वह किसकी मदद करना चाहता है. इससे बच्चे को समझ आएगा कि पैसा सिर्फ अपनी पसंद की चीजें खरीदने के लिए ही नहीं होता, बल्कि इसका इस्तेमाल दूसरों की मदद करने के लिए भी किया जा सकता है.
बच्चों को यह समझना भी चाहिए कि पैसे का इस्तेमाल अपनी जरूरतों और इच्छाओं को पूरा करने के लिए किया जा सकता है. अगर बच्चों को हमेशा यह कहा जाए कि पैसा खर्च करना गलत है, तो वे बड़े होकर समझदारी से खर्च करने और बिना सोचे-समझे खर्च करने के बीच का फर्क नहीं समझ पाएंगे. जब बच्चों को थोड़ी आजादी दी जाती है, तो वे अपने फैसलों के परिणाम भी सीखते हैं. हो सकता है कि वे जल्दी-जल्दी सारे पैसे खर्च कर दें और बाद में पछताएं या फिर वे धैर्य रखकर किसी ऐसी चीज के लिए पैसे बचाएं, जिसे वे वास्तव में खरीदना चाहते हैं. इन दोनों ही स्थितियों से बच्चों को पैसों की अहमियत और सही वित्तीय फैसले लेने की सीख मिलती है, जो आगे चलकर उनके बहुत काम आती है.
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