मां बनना हर महिला के लिए जिंदगी का सबसे खूबसूरत एहसास माना जाता है, लेकिन एक महिला के लिए यह पल दर्द और संघर्ष की ऐसी कहानी बन गया जिसे सुनकर किसी की भी आंखें नम हो जाएं. धरा शाह के लिए मां बनने का दिन उनकी जिंदगी के सबसे खूबसूरत पलों में से एक होना था. वो और उनके पति कई महीनों से अपने बच्चे का इंतजार कर रहे थे. लेकिन 27 घंटे तक चली लेबर के बाद कुछ मेडिकल कॉम्प्लिकेशन्स ने उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल दिया.
डिलिवरी के बाद खोया शरीर का हिस्साधरा शाह ने अपने इंस्टाग्राम हैंडल @dharaswonderlife पर अपनी कहानी शेयर करते हुए बताया कि 7 साल पहले वो और उनके पति अपने बच्चे से मिलने के दिन गिन रहे थे. उन्होंने लिखा, '27 घंटे की लेबर पेन के बाद जिस दिन मेरा बच्चा पैदा हुआ, उसी दिन मेरी जिंदगी बदल गई.' धरा ने बताया कि उन्होंने पहली बार अपने बेटे माहिर को देखा, लेकिन कुछ ही देर बाद वो बेहोेश हो गईं. उन्होंने कहा, 'मैंने अपने बेटे माहिर को पहली बार देखा और कुछ ही पल बाद बेहोश हो गई. इसके बाद मेरा दिल धड़कना बंद कर गया.' इस घटना के बाद वो सात दिनों तक कोमा में रहीं. इलाज के दौरान दी गई दवाओं की वजह से उनके हाथ और पैरों में गैंग्रीन हो गया. हालत इतनी गंभीर हो गई कि डॉक्टरों के पास दोनों पैर और दायां हाथ काटने के अलावा कोई दूसरा ऑप्शन नहीं बचा.

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निकालना पड़ा यूटरस और ओवरीजिंदगी की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं. धरा शाह ने बताया कि इलाज के दौरान उनकाा यूटरस और ओवरी निकालने के लिए भी सर्जरी करनी पड़ी. करीब साढ़े चार महीने अस्पताल में बिताने के बाद धरा आखिरकार घर लौटीं. धरा ने याद करते हुए कहा, 'आखिरकार मैं घर वापस आई और पहली बार अपने बेटे माहिर को गोद में लिया.' इस हादसे ने उनके शरीर को पूरी तरह बदल दिया था, लेकिन उन्होंने अपने दर्द को बेटे के साथ बिताए जाने वाले खूबसूरत पलों पर हावी नहीं होने दिया. उन्होंने कहा, 'मैंने बहुत कुछ खो दिया था, लेकिन अपने बच्चे के साथ रहते हुए मैंने कभी अपनी मुस्कान को फीका नहीं पड़ने दिया."
उन दिनों माहिर ही उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी ताकत और उम्मीद बन गया था. धरा एक तरफ व्हीलचेयर पर नई जिंदगी जीना सीख रही थीं, तो दूसरी तरफ अपने बेटे की देखभाल भी कर रही थीं. लेकिन उनके जीवन में दुख अभी भी खत्म नहीं हुआ था.

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10 महीने बाद खोया कलेजे का टुकड़ाधरा शाह ने बताया कि कुछ समय बाद परिवार को पता चला कि उनके बेटे माहिर कोो एक जेनेटिक बीमारी थी, जिसका कोई इलाज मौजूद नहीं था. समय के साथ उसकी तबीयत लगातार बिगड़ती चली गई. धरा ने लिखा, 'उसकी सेहत लगातार खराब होती जा रही थी और सिर्फ 10 महीने बाद मैंने अपने बेटे को खो दिया.' पहले ही जिंदगी के कई बड़े दर्द झेल चुकी धरा के लिए बेटे को खोना किसी गहरे सदमे से कम नहीं था. इस दुख ने उन्हें पूरी तरह से तोड़कर रख दिया. उन्होंने कहा, 'अपने बेटे को खोने के बाद मैं खुद को भी खो बैठी. मैं पूरी तरह टूट गई थी.'
धरा ने बताया कि 'कई महीनों तक मुझे ऐसा लगता था जैसे वह हर जगह मेरे आसपास है. मुझे उसकी मौजूदगी महसूस होती थी और उसकी आवाज सुनाई देती थी'. अपने कलेजे के टुकड़े को खोने का दुख ऐसा नहीं था जिसे वे आसानी से भुला पातीं. एक तरफ उन्होंने बीमारियों का सामना किया, कई बड़ी सर्जरी करवाईं और महीनों अस्पताल में रहने के बाद घर लौटीं, वहीं दूसरी तरफ जिस बच्चे को गोद में लेने के लिए उन्होंने इतना संघर्ष किया था, उसे भी खो दिया. हालांकि, समय के साथ उनके जीवन में एक बदलाव आया. दुख और दर्द धीरे-धीरे उनकी ताकत बनने लगा. आखिरकार उन्होंने अपने बेटे की यादों को ही आगे बढ़ने और जिंदगी को फिर से जीने की वजह बना लिया.

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धीरे-धीरे आगे बढ़ी धराधरा शाह ने बताया कि बेटे माहिर की यादों ने उनकी सोच और जिंदगी को देखने का नजरििया पूरी तरह बदल दिया. उन्होंने कहा, 'फिर मैंने सोचा कि अगर मेरा छोटा सा बेटा अपने 10 महीनों के जीवन में इतनी बहादुरी से लड़ सकता है, तो मुझे भी हार नहीं माननी चाहिए.' इसके बाद धरा ने धीरे-धीरे अपनी जिंदगी को फिर से संभालना शुरू किया. उन्होंने छोटी-छोटी चीजों से शुरुआत की. धरा ने बताया कि उन्होंने व्हीलचेयर पर अपने सारे काम खुद करना शुरू किए. फिर वॉकर की मदद से चलना सीखा और आखिरकार अपने पैरों पर खड़ी होने लगी.'

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पूरी की 5 किलोमीटर की दौड़इस संघर्ष भरे दौर में उनके पति ने हर कदम पर उनका साथ दिया. धरा कहती हैं कि उनके पति ने आगे बढ़ते रहने की ताकत दी. धीरे-धीरे उन्होंने उस जिंदगी को फिर से संवारना शुरू किया, जो एक के बाद एक दर्दनााक घटनाओं के कारण पूरी तरह बदल चुकी थी. धीरे-धीरे उन्होंने दौड़ना शुरू किया. कुछ समय बाद उन्होंने अपनी पहली 5 किलोमीटर की दौड़ सफलतापूर्वक पूरी की. इस उपलब्धि को उन्होंने अपने दिवंगत बेटे माहिर को समर्पित किया. धरा ने कहा कि मैंने अपनी पहली 5 किलोमीटर की दौड़ पूरी की और उसे अपने बेटे माहिर को समर्पित किया.
धरा के लिए यह सिर्फ एक दौड़ नहीं थी, बल्कि उस लंबे संघर्ष का प्रतीक थी, जो अस्पताल के बिस्तर से शुरू होकर दुख, दर्द, पुनर्वास और फिर से अपने पैरों पर खड़े होने तक पहुंचा था. उनकी कहानी केवल शारीरिक विकलांगता पर जीत हासिल करने की नहीं है, बल्कि अपने बच्चे को खोने के दर्द से उबरकर दोबारा जिंदगी में आगे बढ़ने की भी है.
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