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Rajouri Garden का नाम आखिर “राजौरी” क्यों पड़ा? Partition के दर्द और नई शुरुआत की कहानी

Rajouri Garden का नाम कैसे पड़ा? जानिए Partition के बाद पाकिस्तान से आए शरणार्थियों, पलायन और नई शुरुआत से जुड़ी इस दिल्ली इलाके की दिलचस्प कहानी.

Rajouri Garden का नाम आखिर “राजौरी” क्यों पड़ा? Partition के दर्द और नई शुरुआत की कहानी
Rajouri Market: ये सिर्फ मार्केट नहीं, बंटवारे की याद है. ( AI Image)

Rajouri Garden Name Story: दिल्ली का राजौरी गार्डन (Rajouri Garden) शॉपिंग, फूड और पॉश मार्केट्स के लिए जाना जाता है. यहां पर शादी की शापिंग से लेकर रोजाना के लिए की जाने वाली शॉपिंग के भी बहुत सारे ऑप्शन मिल जाते हैं. यहां पर लेटेस्ट और स्टाइलिश कपड़ों के साथ ही ट्रेडिशनल और इंडियन ड्रेसेस के भी कई सारे स्टोर्स हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये इलाका जहां पर आज के समय में एक खुशनुमा माहौल देखने को मिलता है, इसके नाम के पीछे एक ऐसा किस्सा छिपा हुआ है जो दर्द से भरा है. बहुत कम लोग जानते हैं कि इस इलाके के नाम के पीछे बंटवारे का दर्द, पलायन और नई जिंदगी शुरू करने की कहानी छिपी हुई है. तो चलिए जानते हैं क्या है ये कहानी-

राजौरी नाम की कहानी

असल में “राजौरी” नाम आया है पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर के एक इलाके Rajouri से. दरअसल साल 1947 में जब भारत-पाकिस्तान का बंटवारा हुआ तब लाखों की संख्या में लोग राजौरी और उसके आसपास के इलाकों से निकलकर दिल्ली की तरफ आए और यहां पर नई जिंदगी जीने लगे. यहीं से आया है राजौरी शब्द.

राजौरी गार्डन

बंटवारे के बाद कई शरणार्थी दिल्ली में आकर बस गए थे, जिनमें से एक इलाका बाद में “राजौरी गार्डन” कहलाया. ऐसा माना जाता है कि यहां पर रहने वाले लोग  जम्मू-कश्मीर के राजौरी इलाके से आए थे, इसलिए उन्होंने अपने पुराने शहर की याद में इस जगह का नाम “राजौरी” रख दिया. बात करें गार्डन शब्द की तो उस समय में दिल्ली की कई नई कॉलोनियों के नाम से गार्डन शब्द जोड़ा जाता था. इसी तरह से इसका नाम पड़ गया राजौरी गार्डन.

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पहले कैसा था राजौरी गार्डन

जब लोग यहां पर आकर बसे थे तब ये इलाका इतना चमकदार नहीं था. यहां पर बहुत ही छोटे-छोटे मकान थे जिनकी छत टिन से बनी हुई थी और बहुत ही संघर्ष के साथ लोग अपना जीवन जीते थे. फिर लोगों ने अपने जीवन यापन के लिए धीरे-धीरे कारोबार करना शुरू की. किसी ने छोटी दुकान खोली, किसी ने कपड़ों का काम शुरू किया तो किसी ने खाने-पीने का बिजनेस. धीरे-धीरे यही इलाका साउथ दिल्ली का बड़ा कमर्शियल हब बन गया.

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