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120 दिनों तक अनुशासित दिनचर्या अपनाने से बदल गया मेरा जीवन, 40 साल के सिद्धार्थ का अनुभव

Disciplined Routine for 120 Days: 120 दिनों तक अनुशासित दिनचर्या अपनाने से कैसे बदल सकता है जीवन. इस आर्टिकल में जानें 40 साल के सिद्धार्थ द्वारा शेयर अनुभव.

120 दिनों तक अनुशासित दिनचर्या अपनाने से बदल गया मेरा जीवन, 40 साल के सिद्धार्थ का अनुभव
120 दिनों तक अनुशासित दिनचर्या अपनाने से क्या बदल गया मेरा जीवन? (AI Generated Image)

मेरा नाम सिद्धार्थ है और मैं 40 साल का हूं. लंबे समय तक मुझे अपनी अनियमित दिनचर्या कोई बड़ी समस्या नहीं लगी. कभी देर रात तक जागना, कभी बिना तय समय के उठना, खाना-पीना और काम सब अपने हिसाब से चलता रहा. कम उम्र में यह सब नॉर्मल लगता है, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ इसका असर धीरे-धीरे सामने आने लगता है. मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ. थकान बढ़ने लगी, नींद पूरी नहीं होती थी और काम में फोकस कम होता जा रहा था. पहले मुझे लगा कि काम का बोझ ज्यादा है इसलिए मुझे ये परेशानियां हो रही हैं. लेकिन मेरे एक सीनियर ने मुझे बताया कि दिक्कत काम की नहीं, बल्कि बिना सिस्टम वाली लाइफ की है. उन्हीं ने मुझे 4 महीनों के लिए अपना रुटीन सिस्टमैटिक करने की सलाह दी.

यहीं से मैंने तय किया कि अगले 120 दिनों तक अपनी दिनचर्या को थोड़ा व्यवस्थित करूंगा. कोई बहुत बड़ा बदलाव नहीं किया, बस रोजमर्रा की चीजों को तय समय पर करने की कोशिश शुरू की. शुरुआत आसान नहीं थी, क्योंकि पुरानी आदतें बार-बार बीच में आ जाती थीं. लेकिन धीरे-धीरे एक पैटर्न बनता गया.

दिमाग पर सबसे पहले असर दिखा-

कुछ ही हफ्तों में महसूस हुआ कि जब दिन का एक बेसिक स्ट्रक्चर तय हो जाता है, तो दिमाग कम उलझता है. पहले हर छोटी चीज के लिए सोचना पड़ता था, अब कई फैसले अपने आप तय हो जाते थे. इससे फोकस बेहतर हुआ और काम करने में आसानी आने लगी.

नींद और ऊर्जा में बदलाव-

जब मैंने सोने और उठने का समय तय किया, तो सबसे पहले नींद में सुधार दिखा. कुछ ही दिनों में शरीर का रिदम बेहतर होने लगा. पहले जो थकान पूरे दिन रहती थी, वह धीरे-धीरे कम हो गई और दिन भर एनर्जी बनी रहने लगी. 

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काम करने का तरीका बदल गया-

पहले मैं पूरे दिन व्यस्त रहता था, लेकिन उतना काम नहीं हो पाता था. अब जब काम के लिए तय समय होने लगा, तो ध्यान भटकना कम हुआ. धीरे-धीरे कम समय में ज्यादा काम होने लगा और दिन ज्यादा प्रोडक्टिव लगने लगा.

अच्छी आदतें खुद बनने लगीं-

सबसे दिलचस्प बदलाव यह था कि कुछ चीजें अपने आप होने लगीं. समय पर उठना, काम को ज्यादा देर तक न टालना और दिन खत्म होने से पहले जरूरी काम निपटाना अब मजबूरी नहीं, आदत बनने लगी.

मेंटल स्ट्रेस कम हुआ-

पहले हर समय ऐसा लगता था कि बहुत कुछ अधूरा है. लेकिन जब दिन थोड़ा व्यवस्थित हुआ, तो यह दबाव भी कम हो गया. चीजें ज्यादा कंट्रोल में महसूस होने लगीं और दिमाग पहले से ज्यादा शांत रहने लगा. दिनचर्या सुधरने के साथ बाकी चीजें भी अपने आप ठीक होने लगीं. खान-पान, सोने-उठने का समय ठीक हुआ. तो दफ्तर सही वक्त पर पहुंचना, लेट नाइट पार्टीज में न जाना, हेल्दी डाइट लेने जैसे आदतें अपने आप आ गईं. घर-परिवार और दोस्तों के लिए समय भी मिलने लगा.

पहले मुझे लगता था कि डेली रुटीन को सिस्टमैटिक बनाने के लिए खुद के लिए काफी सख्त होना पड़ता होगा, लेकिन अब मुझे यह एहसास हुआ कि अनुशासन कोई सख्ती नहीं, बल्कि एक सिस्टम है जो जिंदगी को आसान बनाता है. बिगड़े हुए रूटीन का असर आज नहीं तो कल किसी के भी शरीर और दिमाग पर पड़ता ही है. बेहतर है कि सभी अपनी दिनचर्या को समय रहते सुधारकर व्यवस्थित कर लें.

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