Success Story: ड्रॉपआउट्स की कहानियां आपने खूब सुनी होंगीं, जिन्होंने कॉलेज छोड़ने के बाद कुछ ऐसा किया कि उनका नाम आज दुनिया के तमाम बड़े दिग्गजों में शुमार है. एक ऐसे ही शख्स की कहानी सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है, लेकिन ये थोड़ी अलग है. पवन चिंदुकुरी NIT से ड्रॉपआउट हैं, सॉफ्टवेयर डेवलपर के तौर पर उनकी पहली सैलरी महज 3 हजार रुपये महीने से शुरू हुई, लेकिन उन्होंने अपने हुनर और मेहनत से इसे 58 लाख का पैकेज बना दिया. हालांकि फिलहाल वो नौकरी की तलाश कर रहे हैं, क्योंकि हाल ही में उनका नाम छंटनी में आ गया.
डिग्री की जगह चुनी स्किल
पवन एक आम परिवार से आते हैं और उनका एडमिशन एनआईटी में हुआ था, जहां एडमिशन पाने के लिए हर साल लाखों युवा एग्जाम देते हैं. हालांकि पवन ने पहले ही साल में ड्रॉप ले लिया और थ्योरी पढ़ने की बजाय हैंड्स-ऑन कोडिंग में हाथ आजमाया. सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट में उनकी दिलचस्पी बढ़ती रही और बिना किसी बीटेक डिग्री के वो नौकरी करने लगे. इसके चलते शुरुआत में उन्हें दिक्कत भी हुई, लेकिन बाद में पवन ने तमाम टूल्स पर महारथ हासिल कर ली और अपनी स्किल्स को डिग्री वालों जितना मजबूत कर लिया.
6 साल में 58 लाख पैकेज का सफर
पवन ने शुरुआती दौर में इंटर्नशिप कर गुजारा किया, इस दौरान उन्हें 3 हजार रुपये मिलते थे. इसके बाद उनकी स्किल और टैलेंट को देखते हुए सैलरी 50 हजार हुई और फिर 1.20 लाख तक पहुंच गई. करीब चार साल बाद काम करने के बाद ग्लोबल कंपनियों के साथ उन्होंने रिमोट वर्क करना शुरू कर दिया, आखिर में उनकी सैलरी 58 लाख सालाना तक पहुंच गई.
छंटनी में आ गया नाम
Praveen Singampalli नाम के लिंक्डिन यूजर ने उनकी ये पूरी कहानी सोशल मीडिया पर बयां की थी. उन्होंने बताया कि 6 साल काम करने के बाद पवन का नाम छंटनी में आ गया और उन्हें नौकरी से हाथ धोना पड़ा. एनडीटीवी से बात करते हुए पवन ने बताया कि एआई के इस आधुनिक दौर में कंपनियों को उम्मीदवारों का मूल्यांकन केवल उनकी डिग्री या कॉलेज के नाम के आधार पर नहीं करना चाहिए. इस दौरान उनके टैलेंट और स्किल को देखना चाहिए.
उन्होंने कहा कि डिग्री नहीं होने के बावजूद अगर किसी के पास मजबूत स्किलसेट और सीखने की ललक है, तो वो दुनिया के किसी भी कोने से बेहतरीन काम करके दिखा सकता है. फिलहाल वे नए अवसरों की तलाश में हैं और उनकी यह यात्रा युवाओं को प्रेरित कर रही है. पवन ने बताया कि उनकी रिमोट जॉब से उन्हें हर घंटे के हिसाब से पैसे मिलते थे. उन्हें एक घंटे का 28 डॉलर यानी करीब 2700 रुपये मिलता था.
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