Recruitment Delay : कोई 15 साल से नौकरी की तैयारी कर रहा है, तो कोई NET, CTET और STET जैसी कई परीक्षाएं पास करने के बावजूद बेरोजगार है. किसी के पिता किसान हैं और बेटे की पढ़ाई के लिए कर्ज लेना पड़ता है, तो कोई गांव जाना छोड़ चुका है क्योंकि वहां उम्र और बेरोजगारी को लेकर ताने सुनने पड़ते हैं. BPSC TRE-4 को लेकर चल रहे विवाद के बीच अभ्यर्थियों की कहानी सिर्फ परीक्षा और सिलेबस की नहीं, बल्कि उम्मीद, इंतजार, आर्थिक संघर्ष और टूटते मनोबल की भी है.
बिहार में शिक्षक भर्ती परीक्षा TRE-4 को लेकर अभ्यर्थियों का आंदोलन लगातार चर्चा में है. अभ्यर्थी सिलेबस, परीक्षा के पैटर्न और भर्ती प्रक्रिया में किए गए बदलावों को लेकर सवाल उठा रहे हैं. लेकिन आंदोलन के नारों और मांगों के पीछे हजारों युवाओं की ऐसी निजी कहानियां हैं, जिनमें कई सालों की तैयारी, परिवार की उम्मीदें और नौकरी मिलने का लंबा इंतजार शामिल है.
NDTV से बातचीत में TRE-4 अभ्यर्थियों ने बताया कि उनके लिए यह सिर्फ एक परीक्षा नहीं है. कई लोगों के लिए नौकरी का मतलब परिवार की आर्थिक स्थिति बदलना है. किसी की बहन की शादी की चिंता है, किसी को बूढ़े होते माता-पिता की उम्मीदें पूरी करनी हैं और किसी को समाज के सवालों का जवाब देना है.
'15 साल से शहर में हूं, माता-पिता इंतजार कर रहे हैं कि बेटा कमाएगा'मधुबनी के रहने वाले वीरेंद्र कुमार पिछले करीब 15 साल से शहर में रहकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं. वह TRE-4 के साथ दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं की भी तैयारी करते हैं. वीरेंद्र बताते हैं कि इतने लंबे समय तक तैयारी करने के बाद मानसिक दबाव बहुत बढ़ जाता है.
उन्होंने कहा कि इंटर पास करने के बाद से ही वह प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटे हैं. उनके मुताबिक, 15 साल तक एक युवा के माता-पिता इस उम्मीद में रहते हैं कि अब उनका बेटा नौकरी करेगा और घर की आर्थिक स्थिति सुधरेगी.
वीरेंद्र कहते हैं कि यह सिर्फ उनकी कहानी नहीं है. आंदोलन में मौजूद हजारों अभ्यर्थियों के परिवार इसी उम्मीद में वर्षों से इंतजार कर रहे हैं. कई अभ्यर्थियों के माता-पिता खेती करते हैं और सीमित संसाधनों के बावजूद बच्चों को पढ़ने के लिए शहर भेजते हैं.
उनका कहना है कि एक नौकरी पर कई परिवारों की उम्मीदें टिकी होती हैं. किसी को बहन की शादी करनी है, किसी को अपनी शादी की चिंता है और किसी को माता-पिता की इच्छाएं पूरी करनी हैं.
वीरेंद्र की सबसे बड़ी शिकायत भर्ती नियमों में बदलाव को लेकर है. उनका कहना है कि जब अभ्यर्थी लंबे समय तक एक निश्चित पैटर्न के अनुसार तैयारी करते हैं और लक्ष्य के करीब पहुंचते हैं, तब नियम बदल जाने से उन्हें फिर से शुरुआत करनी पड़ती है.
संस्कृत शिक्षक को इतिहास-भूगोल क्यों पढ़ना होगा?TRE-4 के नए सिलेबस को लेकर भी अभ्यर्थियों में नाराजगी है. वीरेंद्र का सवाल है कि अगर कोई अभ्यर्थी संस्कृत विषय का शिक्षक बनने की तैयारी कर रहा है तो उससे इतिहास और भूगोल से उसी स्तर के सवाल पूछने का क्या औचित्य है.
उनका सुझाव है कि अगर प्रारंभिक परीक्षा कराई जानी है तो कम से कम 50 प्रतिशत सवाल अभ्यर्थी के संबंधित विषय से होने चाहिए. बाकी 50 प्रतिशत में सामान्य ज्ञान और दूसरे सामान्य विषयों को शामिल किया जा सकता है.
वीरेंद्र कहते हैं कि पहले TRE-1, TRE-2 और TRE-3 की परीक्षा एक अलग पैटर्न पर हुई थी. ऐसे में अभ्यर्थियों ने उसी आधार पर अपनी तैयारी की. अब अंतिम समय में परीक्षा का ढांचा बदलने से उनकी तैयारी प्रभावित हो रही है.
उनकी नाराजगी सिर्फ परीक्षा से नहीं, बल्कि उस लंबे इंतजार से भी है जो उनके जीवन का बड़ा हिस्सा बन चुका है. वीरेंद्र कहते हैं, "जिंदगी का एक चौथाई हिस्सा इंतजार में निकल जाता है."
NET, CTET और STET पास, फिर भी नौकरी का इंतजारएक अन्य अभ्यर्थी अंकित पिछले करीब तीन साल से TRE-4 और BPSC की तैयारी कर रहे हैं. उनकी निराशा इस बात को लेकर है कि योग्यताएं और डिग्रियां होने के बावजूद नौकरी नहीं मिल पा रही है. अंकित बताते हैं कि उनके पास CTET, STET और NET जैसी योग्यताएं हैं. इसके बावजूद वह शिक्षक की नौकरी के लिए संघर्ष कर रहे हैं.
उनका कहना है कि TRE-4 की भर्ती को लेकर पहले घोषणा हुई, लेकिन प्रक्रिया में देरी होती चली गई. करीब ढाई से तीन साल का समय बीतने के बाद भी अभ्यर्थियों का इंतजार खत्म नहीं हुआ. अंकित की बातों में बेरोजगारी का दर्द साफ दिखाई देता है. वह कहते हैं कि इतने योग्य युवाओं का वर्षों तक नौकरी के लिए इंतजार करना सिर्फ उनका व्यक्तिगत दुर्भाग्य नहीं, बल्कि व्यवस्था पर भी सवाल खड़ा करता है.
31 साल की उम्र हो गई, गांव जाना छोड़ दियाअंकित बताते हैं कि बेरोजगारी ने उनके सामाजिक जीवन को भी प्रभावित किया है. उनकी उम्र 31 साल हो चुकी है और वह गांव जाना कम कर चुके हैं.
वजह है लोगों के सवाल और ताने.उनका कहना है कि जब कोई युवा अच्छी पढ़ाई करने के बावजूद वर्षों तक नौकरी हासिल नहीं कर पाता तो समाज भी सवाल करने लगता है. अंकित बताते हैं कि उन्होंने जवाहर नवोदय विद्यालय से पढ़ाई की है और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा हासिल की है. उनके पास मास्टर्स की डिग्री के साथ NET, CTET और STET जैसी योग्यताएं भी हैं. इसके बावजूद नौकरी नहीं मिलना उनके लिए गहरी निराशा का कारण है.
उनकी कहानी यह सवाल उठाती है कि परीक्षा पास करने की योग्यता और नौकरी मिलने के बीच अगर वर्षों का अंतर हो जाए तो उस युवा के जीवन पर क्या असर पड़ता है?
पेपर लीक की खबर सुनते ही टूटने लगता है मनोबलअभ्यर्थियों के लिए परीक्षा की तैयारी सिर्फ किताबें पढ़ना नहीं है. इसमें समय, पैसा और मानसिक ऊर्जा भी लगती है. ऐसे में जब किसी परीक्षा में गड़बड़ी या पेपर लीक की खबर सामने आती है तो उसका असर सीधे अभ्यर्थियों के मनोबल पर पड़ता है.
अंकित कहते हैं कि लगातार परीक्षा रद्द होने और पेपर लीक की खबरों से अभ्यर्थी बहुत निराश हो जाते हैं. एक परीक्षा के लिए महीनों और कई बार वर्षों तक तैयारी की जाती है. परीक्षा देने के बाद अगर पता चले कि उसमें गड़बड़ी हुई है या परीक्षा रद्द हो गई है, तो अभ्यर्थी को फिर से शुरुआत करनी पड़ती है.
अभ्यर्थियों का कहना है कि इस तरह की घटनाओं से उनके मन में अपनी मेहनत को लेकर भी सवाल पैदा होने लगते हैं. उन्हें लगता है कि क्या केवल मेहनत के भरोसे नौकरी मिल पाएगी?
हालांकि अभ्यर्थियों ने बातचीत में पेपर लीक और परीक्षाओं से जुड़े कई गंभीर आरोप और दावे भी किए. इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि अलग से जरूरी है. लेकिन एक बात स्पष्ट है कि परीक्षा की विश्वसनीयता को लेकर पैदा हुआ संदेह अभ्यर्थियों के मानसिक दबाव को और बढ़ा देता है.
कभी-कभी लगता है पढ़ाई ही छोड़ देंओम प्रकाश भारती करीब ढाई साल से TRE-4 की तैयारी कर रहे हैं. उनका कहना है कि उन्होंने पहले की शिक्षक भर्ती परीक्षाओं के पैटर्न को देखकर तैयारी शुरू की थी. उन्हें उम्मीद थी कि TRE-1, TRE-2 और TRE-3 की तरह TRE-4 की परीक्षा भी होगी.
लेकिन लंबे इंतजार के बाद सिलेबस और परीक्षा प्रक्रिया में बदलाव की बात सामने आई तो उनकी चिंता बढ़ गई.
ओम प्रकाश कहते हैं कि पेपर लीक या परीक्षा में गड़बड़ी की खबरें सुनकर कई बार इतना निराश महसूस होता है कि पढ़ाई छोड़ देने का मन करता है.
उनके मुताबिक, जब अभ्यर्थी लंबे समय तक ईमानदारी से तैयारी करता है और फिर भर्ती प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं तो उसे अपनी मेहनत और योग्यता पर भी शक होने लगता है.
किसान पिता, शहर में पढ़ता बेटा और घर से पैसे का इंतजारओम प्रकाश के पिता किसान हैं. वह घर से दूर रहकर तैयारी करते हैं. ऐसे में पढ़ाई का खर्च भी परिवार के लिए एक बड़ी चुनौती है.
उनका कहना है कि परिवार की तरफ से लगातार दबाव रहता है. घरवालों को यह भी उम्मीद रहती है कि बेटा इतने वर्षों से पढ़ाई कर रहा है तो अब नौकरी जरूर मिलेगी. लेकिन लंबे समय तक सफलता नहीं मिलने पर अभ्यर्थी अपनी परेशानियां परिवार के सामने भी पूरी तरह नहीं रख पाता.
एक तरफ परिवार की आर्थिक स्थिति होती है और दूसरी तरफ पढ़ाई का खर्च. किराया, खाना, किताबें, कोचिंग और दूसरे खर्च लगातार चलते रहते हैं. नौकरी न होने की स्थिति में यह आर्थिक दबाव बढ़ता जाता है.
10 साल से तैयारी, फिर भी परीक्षा की तारीख का इंतजारशंकर सुमन TRE-4 के साथ BSSC दरोगा और रेलवे जैसी परीक्षाओं की भी तैयारी कर रहे हैं. वह करीब 10 साल से प्रतियोगी परीक्षाओं की दुनिया में हैं.
शंकर कहते हैं कि इतने लंबे समय तक तैयारी करने वाला युवा मानसिक रूप से कई तरह के दबावों से गुजरता है. परिवार का दबाव अलग होता है और समाज का दबाव अलग.
उनकी शिकायत परीक्षा कैलेंडर और भर्ती प्रक्रिया में होने वाली देरी को लेकर भी है. उनका कहना है कि कई परीक्षाओं के फॉर्म भरने के बाद अभ्यर्थियों को लंबे समय तक परीक्षा की तारीख का इंतजार करना पड़ता है.
शंकर के मुताबिक, TRE-4 बिहार के युवाओं के लिए एक बड़ा मुद्दा बन गया है क्योंकि बड़ी संख्या में अभ्यर्थी लंबे समय से शिक्षक भर्ती का इंतजार कर रहे हैं.
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