- सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु और लिविंग विल को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का अधिकार माना था.
- लिविंग विल में व्यक्ति पहले से लिखित निर्देश दे सकता है कि असाध्य बीमारी में कृत्रिम उपचार न दिया जाए.
- अस्पताल में मरीज की स्थिति जांचने के लिए दो मेडिकल बोर्ड बनाकर ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट की स्वीकृति आवश्यक थी.
2018 में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसले में पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु और लिविंग विल को मान्यता दी थी. पांच जजों के संविधान पीठ ने यह फैसला एनजीओ कॉमन कॉज द्वारा दायर याचिका पर आया था. तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस ए.के सीकरी, जस्टिस ए एम खानविलकर, जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस अशोक भूषण की संविधान पीठ ने कहा कि गरिमा के साथ मरने का अधिकार, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा है.
इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा ऐसे मरीज, जो असाध्य बीमारी (terminal illness) से पीड़ित हों और जीवनरक्षक उपकरणों पर निर्भर हों, उनके इलाज को वापस लेने या रोकने की अनुमति दी जा सकती है.
बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 13 साल से अचेत अवस्था में पड़े गाजियाबाद के युवक हरीश राणा को पैसिव यूथेनेशिया (इच्छामृत्यु) देने की अनुमति दे दी. यह देश का पहला मामला है जिसमें 2018 के कॉमन कॉज फैसले को कानूनी रूप से लागू करते हुए पैसिव यूथेनेशिया की मंजूरी दी गई है.
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला ने कहा, 'होना या न होना... यह निर्णय अब 'मरने का अधिकार' के संदर्भ में हमें मार्ग दिखाता है. उन्होंने कहा कि यह वाक्य अदालत के सामने जीवन बनाम गरिमा का प्रश्न सामने आया है. एक अन्य उद्धरण, 'भगवान किसी से नहीं पूछते कि क्या वह जीवन स्वीकार करता है... आपको इसे अवश्य लेना चाहिए.' उन्होंने कहा कि यह पंक्ति तब महत्वपूर्ण है जब न्यायालय पूछता है कि किस व्यक्ति को जन्म का अधिकार हो सकता है?
SC ने कहा, यह पहला निष्क्रिय इच्छामृत्यु का मामला है जहां 2018 कॉमन कॉज़ दिशानिर्देशों को कानूनी रूप से लागू किया गया है. कोर्ट ने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि SC दिशानिर्देशों के अनुरूप इच्छामृत्यु पर एक व्यापक कानून लाएं.
अदालत ने लिविंग विल को वैध माना
इसका मतलब है कि कोई भी व्यक्ति पहले से लिखित रूप में यह निर्देश दे सकता है कि अगर वह भविष्य में असाध्य बीमारी से पीड़ित हो जाए और ठीक होने की संभावना न हो, तो उसे कृत्रिम जीवनरक्षक उपचार न दिया जाए.
कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को अनावश्यक रूप से मशीनों के सहारे जीवित रखना उसकी गरिमा के खिलाफ हो सकता है. फैसले में विस्तृत प्रक्रिया तय की गई कि लिविंग विल कैसे बनाई जाएगी और अस्पताल किस तरह से जीवनरक्षक उपचार हटाने का निर्णय ले सकते हैं.
लिविंग बिल बनाने की प्रक्रिया
कोई भी संपूर्ण मानसिक क्षमता वाला वयस्क व्यक्ति लिविंग बिल बना सकता है. इसमें व्यक्ति यह लिख सकता है कि अगर भविष्य में वह असाध्य बीमारी या स्थायी कोमा की स्थिति में हो, तो उसे कृत्रिम जीवनरक्षक उपकरणों पर न रखा जाए. यह दस्तावेज दो गवाहों की मौजूदगी में हस्ताक्षरित होना चाहिए, इसे ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (JMFC) द्वारा प्रमाणित किया जाना आवश्यक था.
अस्पताल में क्या प्रक्रिया है?
अस्पताल को पहले एक मेडिकल बोर्ड बनाना होगा, जिसमें संबंधित विशेषज्ञ डॉक्टर शामिल हों. यह बोर्ड मरीज की स्थिति का मूल्यांकन करेगा कि वह टर्मिनल या इररिवर्सिबल स्थिति में है या नहीं.
दूसरा मेडिकल बोर्ड
पहले बोर्ड की सिफारिश के बाद अस्पताल को दूसरा स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड बनाना होगा. दूसरा बोर्ड भी मरीज की स्थिति की समीक्षा करेगा. दोनो मेडिकल बोर्ड की सहमति के बाद फैसले को ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने रखा जाएगा. मजिस्ट्रेट यह सुनिश्चित करेगा कि प्रक्रिया स्वेच्छा और कानून के अनुसार हो रही है.
अगर लिविंग विल न हो
यदि मरीज ने लिविंग विल नहीं बनाई है, तब भी परिवार या नजदीकी रिश्तेदार अस्पताल से जीवनरक्षक उपचार हटाने का अनुरोध कर सकते हैं. ऐसी स्थिति में भी वहीं दो मेडिकल बोर्ड की प्रक्रिया अपनाई जाएगी. अदालत ने कहा कि “गरिमा के साथ मरने का अधिकार” संविधान के अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का हिस्सा है. हालांकि, लिविंग विल/निष्क्रिय इच्छामृत्यु की प्रक्रिया को बाद में 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने और सरल बना दिया.
- मजिस्ट्रेट से प्रमाणन की अनिवार्यता खत्म
- 2018 में ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (JMFC) से प्रमाणित कराना जरूरी था
- 2023 में कोर्ट ने इसे हटाकर प्रक्रिया आसान कर दी
- दो गवाहों की मौजूदगी में साइन होगी
- नोटरी या गजेटेड ऑफिसर द्वारा अटेस्ट की जा सकती है
- मेडिकल बोर्ड की प्रक्रिया आसान
- पहले दो अलग-अलग मेडिकल बोर्ड की जटिल प्रक्रिया थी
- अब पहला मेडिकल बोर्ड अस्पताल के डॉक्टर मरीज की स्थिति का मूल्यांकन करेंगे
- दूसरा बोर्ड 48 घंटे के भीतर निर्णय की पुष्टि करेगा
- कोर्ट ने कहा कि सभी अस्पतालों को इसे लागू करने के लिए स्पष्ट प्रक्रिया बनानी होगी.
- अगर लिविंग विल मौजूद है, तो परिवार और डॉक्टर मिलकर उसकी शर्तों के अनुसार निर्णय लागू कर सकते हैं
- कोर्ट ने कहा कि 2018 की प्रक्रिया बहुत जटिल थी, इसलिए कई मामलों में मरीज की इच्छा लागू ही नहीं हो पाती थी
- इसलिए प्रक्रिया को व्यावहारिक और कम औपचारिक बनाया गया
- कोर्ट ने दोहराया कि गरिमा से मरने का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार का हिस्सा है
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