सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु और लिविंग विल को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का अधिकार माना था. लिविंग विल में व्यक्ति पहले से लिखित निर्देश दे सकता है कि असाध्य बीमारी में कृत्रिम उपचार न दिया जाए. अस्पताल में मरीज की स्थिति जांचने के लिए दो मेडिकल बोर्ड बनाकर ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट की स्वीकृति आवश्यक थी.