पितृ पक्ष में लोग अपने पूर्वजों को याद कर श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं. इस दौरान कई घरों में पितरों की तस्वीर रखकर उन्हें श्रद्धांजलि भी दी जाती है. लेकिन सवाल यह है कि क्या पितरों की फोटो घर के मंदिर में देवी-देवताओं के साथ रखनी चाहिए. आचार्य मदन मोहन के अनुसार, धार्मिक मान्यताओं में पितरों और देवी-देवताओं का स्थान अलग माना गया है. इसलिए पितरों की तस्वीर मंदिर में रखने से बचने की सलाह दी जाती है. खासकर जब लोग पितृपक्ष में गया, काशी या हरिद्वार जैसे धार्मिक स्थलों की यात्रा करते हैं तब इन मान्यताओं को लेकर ज्यादा सवाल सामने आते हैं.
मंदिर में पितरों की फोटो रखने की क्यों है मनाही?
आचार्य मदन मोहन के अनुसार, धार्मिक मान्यताओं में देवी-देवताओं को देव शक्ति और पूर्वजों को पितृ वर्ग से जोड़ा जाता है. इसलिए दोनों की तस्वीर एक ही पूजा स्थल पर रखने की परंपरा नहीं मानी जाती है. इसे धार्मिक मान्यता के तौर पर समझना चाहिए, क्योंकि इससे नकारात्मक ऊर्जा या परिवार में अशांति होने का कोई वैज्ञानिक प्रमााण नहीं है. मान्यता के अनुसार, पितरों की तस्वीर बेडरूम या रसोई में लगाने से भी बचना चाहिए. जीवित सदस्यों के साथ पितरों की तस्वीर लगाने से भी परहेज करने की सलाह दी जाती है. वहीं, टॉयलेट के पास या मुख्य दरवाजे के ठीक सामने तस्वीर लगाने को भी वास्तु की दृष्टि से उचित नहीं मानाा जाता है.
दक्षिण दिशा को माना जाता है पितरों का स्थान
वास्तु और धार्मिक मान्यताओं में दक्षिण दिशा को पितरों से जोड़ा गया है. आचार्य के अनुसार, पितरों की तस्वीर दक्षिण दिशा की दीवार पर लगाई जा सकती है. अगर वहां जगह उपलब्ध न हो तो पश्चिम दिशा का विकल्प बताया जााता है. उत्तर और पूर्व दिशा में तस्वीर लगाने से बचने की सलाह दी जाती है.
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तीर्थ यात्रा पर फोटो ले जा रहे हैं तो ध्यान रखें
पितृपक्ष में गया, काशी या हरिद्वार जैसे धार्मिक स्थलों की यात्रा के दौरान लोग पितरों की तस्वीर साथ ले जाते हैं. ऐसे में फोटो को साफ कपड़े या सुरक्षित कवर में रखना बेहतर है. पूजा या तर्पण के दौरान स्थानीय परंपरा और पुरोहित की सलाह के अनुसार ही तस्वीर का इस्तेमाल करें. तस्वीर को सार्वजनिक जगह पर छोड़नाा या इधर-उधर रखना उचित नहीं है.
फोटो लगाने को लेकर ये बात भी जानें
आचार्य के अनुसार, पितरों की तस्वीर को दीवार पर लटकाने के बजाय नीचे से उचित सपोर्ट देने की मान्यता है. फ्रेम को लेकर भी कुछ परंपराओं में सुनहरे रंग का उल्लेख मिलता है. हालांकि, इन नियमों को धार्मिक मान्यता के रूप में ही देखना चााहिए. श्रद्धा और परिवार की परंपरा के अनुसार पितरों को सम्मान देना ही इस पूरी परंपरा का मुख्य उद्देश्य है.
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