UGC New Rule: यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन यानी UGC के नए नियमों पर बवाल थमने का नाम नहीं ले रहा है. जातिगत भेदभाव के मामलों में एससी-एसटी के साथ ओबीसी को शामिल करने वाले नियम को लेकर सवर्ण छात्र लगातार विरोध कर रहे हैं. यूजीसी की तरफ से सभी कॉलेज और यूनिवर्सिटीज को पिछड़े वर्ग के छात्रों की शिकायतों के लिए एक कमेटी बनाने का निर्देश दिया गया है, साथ ही कमेटी को एक्शन लेने की पावर भी दी गई है. ऐसे में एक बार फिर शिक्ष में आरक्षण की बहस भी तेज हो गई है. सोशल मीडिया पर जनरल कैटेगरी में आने वाले कई लोग एससी-एसटी और ओबीसी आरक्षण को लेकर भी सवाल उठा रहे हैं. ऐसे में आज हम आपको ये बताएंगे कि आखिर शैक्षणिक संस्थानों में इन वर्गों को कितना आरक्षण दिया जाता है.
किसे कितना आरक्षण?
हमारे संविधान में शेड्यूल कास्ट यानी SC और शेड्यूल ट्राइब्स यानी ST को सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण का प्रावधान रखा गया. इसमें एससी को 15% और एसटी को 7.5% रिजर्वेश दिया गया. इसके बाद 1991 में मंडल कमीशन की सिफारिश पर ओबीसी को भी इसमें शामिल कर लिया गया. इसमें अन्य पिछड़ वर्ग यानी ओबीसी को 27 प्रतिशत का रिजर्वेशन दिया गया. इस तरह से शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण करीब 50% तक पहुंच गया.
सुप्रीम कोर्ट में दायर हुई याचिका
एससी-एसटी और ओबीसी को दिए गए आरक्षण के खिलाफ वकील इंदिरा साहनी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी. इस याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने रिजर्वेशन के नियम को बरकरार रखने का फैसला सुनाया, हालांकि इस दौरान कुछ चीजें तय हो गईं. जिनमें 50 प्रतिशत आरक्षण को कैप करना, यानी ये कहा गया कि आरक्षण इससे ज्यादा नहीं बढ़ाया जा सकता है. वहीं ओबीसी के लिए क्रीमी लेयर की परिभाषा भी साफ कर दी गई. इसमें उन लोगों को रिजर्वेशन से बाहर किया गया, जो पहले से ही पढ़े-लिखे या फिर अच्छे पदों पर हैं. हालांकि इसके बाद सरकार 2019 में गरीब सवर्णों (EWS) के लिए 10 प्रतिशत का आरक्षण लेकर आई.
कितनी बढ़ गई भागीदारी?
शिक्षा में आरक्षण मिलने से एससी-एसटी और ओबीसी वर्ग की भागीदारी में भी काफी बढ़ोतरी देखी जा रही है. शिक्षा मंत्रालय की तरफ से जारी रिपोर्ट में बताया गया था कि शैक्षणिक संस्थानों में 2014-15 से 2020-21 के बीच अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और ओबीसी के छात्रों का रजिस्ट्रेशन काफी ज्यादा हुआ. रिपोर्ट के मुताबिक 2024-25 में ऐसे छात्रों के एडमिशन का आंकड़ा 3.85 करोड़ से बढ़कर 4.13 करोड़ हो गया.
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