Supreme Court EWS Medical Seat: सुप्रीम कोर्ट के कई फैसले नजीर साबित होते हैं, वहीं कुछ फैसले ऐसे होते हैं जो हर किसी के दिल को छू जाते हैं. ऐसा ही एक फैसला सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने तब सुनाया जब चीफ जस्टिस समेत पूरी बेंच सीट से उठ रही थी. एक गरीब छात्र की गुहार ने सभी जजों के पैर मानो थाम से दिए हों और कुछ देर की दलील के बाद उस छात्र को ऐसा तोहफा मिला, जिसे वो हमेशा याद रखेगा. मंगलवार 10 फरवरी को CJI सूर्य कांत की बेंच ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के एक छात्र को बड़ी राहत देते हुए उसे मेडिकल सीट देने का निर्देश जारी कर दिया.
वर्चुअल तरीके से हुई सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (NMC) और मध्य प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि छात्र को एक निजी मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस कोर्स में दाखिला दिया जाए. दाखिला देने के अदालती फैसले कोई नई बात नहीं है, लेकिन ये जो घटना हुई वो अनूठी है. पहली बात ये फैसला CJI सूर्य कांत की अगुवाई में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने उस समय दिया जब वो अपने कोर्ट से जाने के लिए उठ खड़े हुए थे. उसी समय छात्र याचिकाकर्ता अथर्व चतुर्वेदी, जो खुद पक्षकार के रूप में अदालत में पेश हुए, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में वर्चुअल तरीके से अपनी बात रखी.
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सुप्रीम कोर्ट ने समझा गरीब छात्र का दर्द
छात्र की दलीलों को तीनों जज खड़े-खड़े ही सुनने लगे और फिर सरकारी वकीलों से भी जवाब मांगने लगे. करीब दस मिनट चली इस सुनवाई के बाद CJI सूर्य कांत ने खड़े-खड़े ही अपने कोर्ट मास्टर को फैसला लिखाना शुरू किया. फैसले में उन्होंने छात्र की पीड़ा को कुछ इस तरह उकेरा- "हमने ऑनलाइन पेश हुए याचिकाकर्ता को सुना, जिन्होंने EWS कैंडिडेट के तौर पर अपने सामने आई परेशान करने वाली स्थिति और साफ नुकसान को बहुत अच्छे से बताया. हमने नेशनल मेडिकल कमीशन के सीनियर वकील को भी सुना. याचिकाकर्ता आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग (EWS) का एक युवा लड़का है.उसने दो बार NEET परीक्षा पास की है, पहली बार 2024-25 सेशन के लिए और फिर 2025-26 सेशन के लिए. हालांकि, वह अपने कंट्रोल से बाहर साफ तौर पर गलत और खतरनाक हालात की वजह से MBBS कोर्स में एडमिशन नहीं ले पाया."
सुप्रीम कोर्ट ने आगे लिखा, "2024 में पहली परीक्षा के बाद, इस आधार पर छात्र को एडमिशन नहीं दिया गया कि 02.07.2024 के नोटिफिकेशन में, राज्य सरकार ने प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में EWS कैंडिडेट्स के एडमिशन के लिए कोई आरक्षण नहीं किया था. हालांकि मध्य प्रदेश हाईकोर्ट, जबलपुर ने 17.12.2024 के अपने फैसले में याचिकाकर्ता को राहत देने से मना कर दिया था, लेकिन साथ ही उसने अथॉरिटीज को उन प्राइवेट कॉलेजों में EWS कैटेगरी के कैंडिडेट्स को रिजर्वेशन देने के लिए सीटें बढ़ाने का प्रोसेस पूरा करने के लिए एक साल का समय दिया था."
याचिकाकर्ता को कहीं से नहीं मिली थी राहत
सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा, "अभी याचिकाकर्ता एक बार फिर उसी मुश्किल का सामना कर रहा है, यानी, वह प्रतिवादी-अफसरों की तरफ से सीटें बढ़ाने और तय करने की प्रक्रिया में फेल होने की वजह से किसी प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में MBBS कोर्स में एडमिशन नहीं ले पा रहा है.रिकॉर्ड में यह साफ दिखता है कि राज्य प्राधिकरण ने ऐसा कोई प्रोसेस पूरा नहीं किया है. नेशनल मेडिकल कमीशन के सीनियर वकील के पास भी याचिकाकर्ता को देने के लिए कोई एक्शनेबल राहत नहीं है, सिवाय इसके कि पॉलिसी फाइनल होने के प्रोसेस में है और इसे सही समय पर लागू कर दिया जाएगा."
अपनी विशेष शक्तियों का किया इस्तेमाल
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला देते हुए कहा, "एक बार यह पूरा हो जाने के बाद, यह सही है कि प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों को इसे लागू करने में और समय लग सकता है. अगर इस देरी से याचिकाकर्ता को मिलने वाली राहत और कम हो जाती है, तो यह उसके लिए बहुत ज़्यादा नुकसानदायक होगा. एडमिशन के पिछले और मौजूदा राउंड में उसकी पूरी कोशिशों और प्रतिवादी की तरफ से अपनी पॉलिसी को लागू करने में तेजी की कमी को देखते हुए, हम भारत के संविधान के आर्टिकल 142 के तहत मिली अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करना चाहते हैं और यह सही समझते हैं कि ये निर्देश जारी किए जाएं." सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतिम फैसले में लिखा-
(A) नेशनल मेडिकल कमीशन और मध्य प्रदेश राज्य को, मेडिकल एजुकेशन डिपार्टमेंट के जरिए, यह पक्का करने का निर्देश दिया जाता है कि याचिकाकर्ता को किसी एक प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में MBBS कोर्स में एडमिशन मिले.
(B) ऐसा एडमिशन पूरी तरह से सेशन 2025-2026 में उसके EWS रैंक 164 के अनुसार होगा और इसके लिए EWS कैटेगरी के कैंडिडेट्स के लिए तय फीस वगैरह जमा करनी होगी.
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