सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक बेहद अहम मामले की सुनवाई के दौरान मौखिक टिप्पणी की है. अदालत ने कहा कि वह केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) को ओडिशा हाई कोर्ट के उस फैसले को पूरे देश में लागू करने का निर्देश जारी करेगा, जिसमें APAAR ID के सहमति फॉर्म में माता-पिता को स्पष्ट रूप से हां या ना (Opt-out) का विकल्प देने की बात कही गई है.
यह पूरा मामला उन अभिभावकों की याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया, जिन्होंने APAAR योजना की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है. उनका कहना है कि यह योजना जमीन पर छात्रों को आधार कार्ड बनवाने के लिए मजबूर करती है. साथ ही, इससे बच्चों की निजता और उनके पर्सनल डेटा की सुरक्षा को लेकर भी कई गंभीर सवाल उठते हैं.
शिक्षा के अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव का तर्कयाचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने दलील दी कि सरकार भले ही APAAR योजना को स्वैच्छिक बताती है,लेकिन यह आधार कार्ड से जुड़ा होने के कारण व्यावहारिक रूप से अनिवार्य बन जाती है.
उन्होंने कहा कि यदि छात्रों को परीक्षा देने या अन्य शैक्षणिक कार्यों के लिए APAAR ID की आवश्यकता पड़ती है, तो यह शिक्षा के अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है.
मौलिक अधिकार का हननइंदिरा जयसिंह ने यह भी कहा कि शिक्षा का अधिकार एक मौलिक अधिकार है, इसलिए किसी बच्चे को परीक्षा या शिक्षा के लिए आधार या APAAR ID लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता.
हर सरकारी योजना को संदेह से न देखें: मुख्य न्यायाधीशसुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने कहा कि हर सरकारी योजना को संदेह की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए. उनके अनुसार, APAAR योजना का उद्देश्य प्रत्येक छात्र के लिए एक यूनिक अकादमिक पहचान बनाना है, जिससे छात्रों का रिकॉर्ड सुरक्षित रहे और शिक्षा व्यवस्था को बेहतर ढंग से संचालित किया जा सके.
हालांकि, अदालत ने यह भी माना कि योजना का उद्देश्य उचित हो सकता है, लेकिन इसे कानून के अनुसार और उचित प्रक्रिया के तहत लागू किया जाना चाहिए .
पूरे देश में लागू होगा ओडिशा हाई कोर्ट का आदेशसुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह CBSE को निर्देश देगा कि उड़ीसा हाईकोर्ट के आदेश को पूरे देश में लागू किया जाए. APAAR के सहमति फॉर्म में स्पष्ट रूप से “सहमति नहीं” और योजना से बाहर निकलने (Opt-out) का विकल्प दिया जाए. योजना को डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) अधिनियम, 2023 के प्रावधानों के अनुसार लागू किया जाए.
शुरुआत में ही हो 'ना' का अधिकारउड़ीसा हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि यदि सरकार APAAR योजना को स्वैच्छिक बताती है, तो सहमति फॉर्म में माता-पिता को शुरुआत में ही सहमति देने या मना करने का स्पष्ट विकल्प मिलना चाहिए.
अदालत ने कहा कि केवल बाद में सहमति वापस लेने का विकल्प पर्याप्त नहीं है. अगर योजना वास्तव में स्वैच्छिक है, तो शुरुआत में ही “ना” कहने का अधिकार भी होना चाहिए.
बता दें कि हाई कोर्ट ने इसके लिए केंद्र सरकार को दो महीने के भीतर सहमति फॉर्म में जरूरी संशोधन करने पर विचार करने का निर्देश दिया था, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट देशभर में लागू करने की तैयारी में है.
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