इंदौर के एक बच्चे को स्कूल से इसलिए निकाल दिया गया था क्योंकि उसने स्कूल टीचर्स से जुड़ा एक आपत्तिजनक मीम फैलाया था. ये बच्चा इस साल 10वीं क्लास का एग्जाम देने वाला था. लेकिन स्कूल से निकाले जाने के कारण एग्जाम में ये बच्चा नहीं बैठ सकता है. ऐसे में ये मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार इस मामले की सुनवाई की और नाबालिग लड़के को 10वीं की परीक्षा में बैठने की इजाज़त दी, साथ ही काउंसिल फॉर द इंडियन स्कूल सर्टिफिकेट एग्जामिनेशन (CISCE) को एडमिट कार्ड जारी करने का निर्देश दिया.
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस बी वी नागरत्ना और उज्जल भुयान की बेंच ने कहा कि लड़के ने परीक्षा देने के लिए पहले ही CISCE में रजिस्टर कर लिया है और अगर उसे इजाज़त नहीं दी गई, तो उसका एक एकेडमिक साल बर्बाद हो जाएगा. "इन हालात में, हम CISCE को निर्देश देते हैं कि वह पिटीशनर के बेटे को एडमिट कार्ड/हॉल टिकट देकर परीक्षा देने की इजाज़त दे. विवाद के नेचर को देखते हुए, रेस्पोंडेंट नंबर 5 (स्कूल) को पिटीशनर के बेटे को दूसरे स्टूडेंट्स के साथ नहीं, बल्कि एक अलग कमरे में परीक्षा देने और लिखने की इजाज़त देने की आजादी है.
"वह एक बुरा लड़का है"
कोर्ट ने स्कूल और CISCE से यह पक्का करने को कहा कि छात्र 17 फरवरी से शुरू होने वाली अगली परीक्षा में बैठ सके. सुनवाई के दौरान, बेंच ने कहा, "उसे सुधारने के बजाय, आपने (स्कूल) उसे रस्टिकेट करने और खुद को उससे अलग करने का फैसला किया है. एक स्कूल के तौर पर, आपको बच्चे को सुधारने की ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए थी, लेकिन आपने उसे सिर्फ़ इसलिए निकाल दिया क्योंकि आपने कहा कि वह एक बुरा लड़का है." पिटीशनर की तरफ़ से पेश हुए एडवोकेट निपुण सक्सेना ने कहा कि अगर कोर्ट लड़के को परीक्षा देने की इजाज़त नहीं देता है, तो उसका एक एकेडमिक साल बर्बाद हो जाएगा.
उन्होंने कहा कि लड़के को स्कूल से निकालना एक बहुत बड़ी सजा थी और सुधार के कदम उठाने के बजाय, स्कूल ने बस उसे स्कूल से अलग कर दिया. सक्सेना ने कोर्ट को बताया कि लड़का ट्यूटर की मदद से घर पर प्राइवेट तौर पर अपनी पढ़ाई कर रहा है.
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