हजारों साल पहले रचित ऋग्वेद, हिंदू धर्म के चार वेदों में से प्रथम माना जाता है. इस वेद में लिखा गया नासदीय सूक्त (ऋग्वेद 10.129) भारतीय दर्शन के सबसे गहन और रहस्यमय वैदिक मंत्रों में से एक माना जाता है. यही वजह है कि यह सूक्त केवल धार्मिक या दार्शनिक ग्रंथ का हिस्सा नहीं, बल्कि ब्रह्मांड की उत्पत्ति पर मानव की सबसे प्राचीन बौद्धिक जिज्ञासाओं में से एक माना जाता है.
क्या है नासदीय सूक्त
नासदीय शब्द का अर्थ है- न सत था, न असत था. सूक्त की शुरुआत इन पंक्तियों से होती है-
नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं
नासीद्रजो नो व्योमा परो यत्
अर्थात, उस समय न अस्तित्व था, न अनस्तित्व, न आकाश था और न ही उसके परे कुछ.
यह सूक्त सृष्टि की शुरुआत को किसी निश्चित घटना के रूप में नहीं बताता, बल्कि यह प्रश्न करता है कि जब कुछ भी नहीं था, तब यह ब्रह्मांड कैसे अस्तित्व में आया?
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ब्रह्मांड की उत्पत्ति पर क्या कहता है यह सूक्त
नासदीय सूक्त के अनुसार:
प्रारंभ में न दिन था, न रात
न मृत्यु थी, न अमरत्व
न पृथ्वी थी और न आकाश
केवल एक ऐसी सत्ता थी, जो अपनी शक्ति से विद्यमान थी
इसके बाद सृष्टि की उत्पत्ति कैसे हुई, यह एक रहस्य बना रहा
सबसे रोचक बात यह है कि सूक्त किसी निश्चित निष्कर्ष पर नहीं पहुंचता, बल्कि अंत में स्वयं यह प्रश्न उठाता है- क्या सृष्टि का वास्तविक रहस्य कोई जानता है?
सबसे रहस्यमयी अंतिम मंत्र
सूक्त के अंतिम मंत्र में कहा गया है कि संभव है सृष्टि का रहस्य सर्वोच्च देवता ही जानते हों, या फिर शायद वे भी न जानते हों. यही विनम्रता और प्रश्न पूछने की प्रवृत्ति इस सूक्त को विश्व की प्राचीनतम दार्शनिक रचनाओं में विशेष स्थान दिलाती है.
Sources-
ऋग्वेद 10.129 (नासदीय सूक्त)
Encyclopaedia Britannica (Nasadiya Sukta और Cosmology)
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