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NEET PG में अब रैंकिंग सिस्टम लाने की तैयारी, जानें ये पर्सेंटाइल से कितना अलग

NEET PG Rank Based System: नीट पीजी देने वाले छात्रों का रिजल्ट अब पर्सेंटाइल से तय नहीं होगा, इसके लिए रैकिंग जारी होगी. बाकी परीक्षाओं की तरह रैंक के हिसाब से ही सीटें अलॉट की जाएंगीं.

NEET PG में अब रैंकिंग सिस्टम लाने की तैयारी, जानें ये पर्सेंटाइल से कितना अलग
NEET PG में होने वाला है बड़ा बदलाव

MBBS करने के बाद NEET PG देने वाले उम्मीदवारों के लिए बड़ी खबर है. मेडिकल पोस्टग्रेजुएट (PG) कोर्सेज में एडमिशन के नियमों में  सरकार बड़ा बदलाव करने जा रही है. केंद्र की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में बताया गया है कि अगले साल यानी 2027 से पर्सेंटाइल व्यवस्था को खत्म कर दिया जाएगा और इसकी जगह रैंकिंग सिस्टम होगा. इसे लेकर तैयारियां चल रही हैं और जल्द ही आधिकारिक नोटिफिकेशन जारी किया जा सकता है. मेडिकल एडमिशन प्रोसेस के रिव्यू के लिए बनाई गई कमेटी ने इसकी सिफारिश की है. 

कमेटी ने सौंपी अपनी रिपोर्ट

मेडिकल एडमिशन के लिए 12 सदस्यीय एक्सपर्ट कमेटी बनाई गई  थी, जिसने अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में सौंपी है. इसी कमेटी ने छात्रों को पर्सेंटाइल के बजाय उनकी रैंक के आधार पर एडमिशन देने की सिफारिश की है. खास बात ये है कि नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है. फिलहाल इसे 2027 से ही लागू करने पर विचार हो रहा है, लेकिन अंतिम फैसला नहीं लिया गया है. 

कट-ऑफ को लेकर भी फैसला

कमेटी की तरफ से अपनी रिपोर्ट में कट-ऑफ गिराने का जिक्र भी किया गया है. इसमें कहा गया है कि खाली पड़ी मेडिकल सीटों को भरने के लिए बार-बार कटऑफ को बहुच नीचे नहीं गिराना चाहिए. इससे पहले माइनस में भी नंबर होने के चलते एडमिशन मिलने को लेकर विवाद हुआ था, जिसे अब पूरी तरह से खत्म किया जा सकता है. अब अगर ये सिफारिश लागू की जाती है तो नीट पीजी में एडमिशन का विवाद खत्म हो सकता है. इसके अलावा नॉन-क्लीनिकल कोर्सेज की फीस कम करने और प्री-क्लीनिकल व पैरा-क्लीनिकल विषयों के छात्रों को सर्विस बॉन्ड से छूट देने की सिफारिश भी की गई है. 

पर्सेंटाइल और रैंकिंग में क्या है अंतर?

अब ये समझ लेते हैं कि पर्सेंटाइल और रैंकिंग सिस्टम क्या है और इससे कैसे एडमिशन प्रोसेस बेहतर होगा. 

पर्सेंटाइल सिस्टम: पर्सेंटाइल से सीधे नंबर तय नहीं होते हैं, इसमें ये देखा जाता है कि उम्मीदवार के साथ बैठे कितने लोगों को उससे कम या बराबर नंबर मिले हैं. जैसे- किसी परीक्षा में अगर 1 लाख छात्र बैठे हैं और किसी छात्र का स्कोर 90 हजार छात्रों से बेहतर है तो उसका पर्सेंटाइल 90 होता है. यानी एक से ज्यादा उम्मीदवारों को 90 या फिर 100 पर्सेंटाइल मिल सकता है. इसका इस्तेमाल नॉर्मलाइजेशन के तौर पर किया जाता है, जिससे अलग-अलग शिफ्ट में पेपर देने वालों को बराबरी के अंक मिल पाएं. 

रैंकिंग सिस्टम: रैंकिंग सिस्टम सीधा और सपाट होता है. इसमें नंबरों के हिसाब से उम्मीदवारों को 1 से लेकर आखिरी रैंक दी जाती है. यानी हर छात्र का नंबर यूनिक होता है और पारदर्शिता ज्यादा होती है. किसी उम्मीदवार ने अगर 500 में से 499 अंक हासिल किए हैं और उससे ज्यादा नंबर किसी के नहीं हैं तो उसे पहली रैंक दी जाती है, एक जैसे नंबर होने पर टाई ब्रेकिंग रूल का इस्तेमाल किया जाता है. सीट अलॉटमेंट में सीधे रैंक के हिसाब से तय होता है कि कॉलेज किसे दिया जाएगा. 

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