JC Bose Grant : देश के प्रमुख इंजीनियरिंग संस्थानों में शामिल IIT मद्रास के छह प्रोफेसरों को हाल ही में प्रतिष्ठित अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (ANRF) जेसी बोस ग्रांट के लिए चुना गया है. इसके बाद एक बार फिर यह ग्रांट चर्चा में आ गया है. यह भारत के सबसे प्रतिष्ठित रिसर्च ग्रांट्स में से एक माना जाता है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि आखिर जेसी बोस ग्रांट क्या है, किसे मिलता है और इसमें मिलने वाली राशि का इस्तेमाल कैसे किया जाता है. आइए आसान भाषा में समझते हैं.
जेसी बोस ग्रांट क्या है?
ANRF की ओर से दिया जाने वाला जेसी बोस ग्रांट देश के उत्कृष्ट वरिष्ठ वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को उनके बेहतरीन रिसर्च योगदान के लिए दिया जाता है. इसका मकसद ऐसे अनुभवी शोधकर्ताओं को विज्ञान और इंजीनियरिंग के नए और चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में रिसर्च आगे बढ़ाने के लिए अतिरिक्त आर्थिक सहायता देना है.
इस ग्रांट का नाम भारत के महान वैज्ञानिक आचार्य जगदीश चंद्र बोस (जे.सी. बोस) के सम्मान में रखा गया है. उन्होंने रेडियो विज्ञान, भौतिकी और पादप विज्ञान के क्षेत्र में कई अहम खोजें की थीं. आधुनिक भारतीय विज्ञान के शुरुआती दौर के सबसे बड़े वैज्ञानिकों में उनकी गिनती होती है. पहले यह सम्मान जेसी बोस फेलोशिप के नाम से दिया जाता था. अब इसे ANRF जेसी बोस ग्रांट के रूप में संचालित किया जा रहा है.
किसे और कैसे मिलती है ये ग्रांट
इस ग्रांट के लिए वही वैज्ञानिक और इंजीनियर पात्र होते हैं, जिनकी उम्र आवेदन के समय 45 से 65 साल के बीच हो और वे भारत के किसी मान्यता प्राप्त शिक्षण या रिसर्च संस्थान में नियमित पद पर कार्यरत हों. सिलेक्शन के दौरान उनके रिसर्च पेपर्स, पेटेंट, टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट, रिसर्च ग्रांट, पुरस्कार और विज्ञान के क्षेत्र में किए गए दूसरे अहम योगदान को देखा जाता है.
1 लाख रुपये का ओवरहेड सपोर्ट
इस ग्रांट के तहत पांच साल तक हर साल 25 लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी जाती है. यह रकम वैज्ञानिक को व्यक्तिगत आय के रूप में नहीं मिलती, बल्कि रिसर्च प्रोजेक्ट पर खर्च की जाती है. इससे रिसर्च स्टाफ, लैब में इस्तेमाल होने वाले सामान, उपकरण, यात्रा, कंज्यूमेबल्स और रिसर्च से जुड़े दूसरे खर्च पूरे किए जा सकते हैं. इसके अलावा होस्ट संस्थान को हर साल अलग से 1 लाख रुपये का ओवरहेड सपोर्ट भी दिया जाता है.
इस ग्रांट के लिए नामांकन मान्यता प्राप्त संस्थानों के प्रमुख या राष्ट्रीय विज्ञान अकादमियों के अध्यक्ष करते हैं. इसके बाद नामित वैज्ञानिक ANRF पोर्टल पर अपना रिसर्च प्रस्ताव और जरूरी दस्तावेज जमा करते हैं. अंतिम चयन ANRF की विशेषज्ञ समिति करती है.
इस बार IIT मद्रास के छह प्रोफेसरों का चयन हुआ है. इनमें प्रो. सुजाता श्रीनिवासन, प्रो. थलाप्पिल प्रदीप, प्रो. दीपा वेंकटेश, प्रो. जितेंद्र एस. संगवई, प्रो. रामकृष्णन स्वामीनाथन और प्रो. सुंदरगोपाल घोष शामिल हैं. संस्थान के निदेशक प्रो. वी. कामाकोटी ने इसे आईआईटी मद्रास में हो रहे उच्च गुणवत्ता वाले रिसर्च और डेवलपमेंट की पहचान बताया है.
यह भी पढ़ें- IIT Madras के 6 प्रोफेसरों को मिला देश का प्रतिष्ठित JC Bose Grant, 5 साल तक हर साल मिलेंगे 25 लाख
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं