भारत में पिछले कुछ वर्षों में लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए कई सरकारी योजनाएं शुरू की गई हैं. इसका असर है कि अधिकांश लड़कियां प्राथमिक स्तर तक स्कूल जरूर पहुंच रही हैं. लेकिन माध्यमिक शिक्षा, खासकर कक्षा 9 और 10 तक आते-आते स्थिति बदल जाती है. हाल ही में संसद में पेश किए गए सरकारी आंकड़ों के अनुसार, माध्यमिक स्तर (कक्षा 9-10) तक पहुंचने से पहले हर 100 में से लगभग 8 लड़कियां स्कूल छोड़ देती हैं. यानी माध्यमिक शिक्षा तक पहुंचते-पहुंचते बड़ी संख्या में छात्राएं बीच में पढ़ाई छोड़ देती हैं.
प्राथमिक से माध्यमिक स्तर तक बढ़ जाता है ड्रॉपआउट
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, प्राथमिक स्तर पर लड़कियों का ड्रॉपआउट नहीं है. उच्च प्राथमिक स्तर पर यह कुछ बढ़ता है, लेकिन सबसे अधिक गिरावट माध्यमिक स्तर पर दिखाई देती है. यही वह उम्र होती है जब कई सामाजिक, आर्थिक और पारिवारिक चुनौतियां एक साथ सामने आती हैं.
लड़कियां स्कूल क्यों छोड़ देती हैं
इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं. भारतीय परिप्रेक्ष्य में आमतौर पर इन कारणों को जिम्मेदार माना जाता है-
आर्थिक दबाव
कम आय वाले परिवारों में कई बार बच्चों की पढ़ाई जारी रखना मुश्किल हो जाता है. ऐसी स्थिति में कुछ लड़कियों को परिवार की आय बढ़ाने के लिए काम करना पड़ता है या छोटे-मोटे रोजगार से जुड़ना पड़ता है.
घरेलू जिम्मेदारियां
कई परिवारों में किशोरावस्था में पहुंचने के बाद लड़कियों पर छोटे भाई-बहनों की देखभाल, खाना बनाना और अन्य घरेलू कामों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है. इससे उनकी नियमित स्कूल उपस्थिति प्रभावित होती है और अंततः कई छात्राएं पढ़ाई छोड़ देती हैं.
शिक्षा को प्राथमिकता न देना
कुछ परिवार अब भी मानते हैं कि लड़कियों की पढ़ाई एक निश्चित स्तर तक ही पर्याप्त है. ऐसे में माध्यमिक शिक्षा के बाद उनकी पढ़ाई रोक दी जाती है.
कम उम्र में शादी का दबाव
देश के कई हिस्सों में आज भी कम उम्र में विवाह की सामाजिक परंपरा पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. किशोरावस्था में पहुंचने के बाद कुछ लड़कियों की पढ़ाई विवाह की तैयारियों या पारिवारिक निर्णयों के कारण रुक जाती है.
सुरक्षा और लंबी दूरी की समस्या
ग्रामीण क्षेत्रों में कई बार माध्यमिक विद्यालय घर से काफी दूर होते हैं. सुरक्षित परिवहन की कमी या परिवार की सुरक्षा संबंधी चिंताओं के कारण भी कई छात्राओं की पढ़ाई प्रभावित होती है.
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