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मोबाइल पर मैसेज पढ़कर किसान बचा रहे फसल, IAS ने समझाया- कैसे एआई बदल रहा गांवों की किस्मत

खेत, अस्पताल और बैंक... दफ्तरों के लिए ये तीन अलग फाइलें हो सकती हैं, लेकिन एक आम भारतीय परिवार के लिए यह जीवन की डोर है. जानिए कैसे UPI के बाद अब AI भारत के सुदूर गांवों की तकदीर बदलने के लिए चौखट पर दस्तक दे चुका है.

मोबाइल पर मैसेज पढ़कर किसान बचा रहे फसल, IAS ने समझाया- कैसे एआई बदल रहा गांवों की किस्मत
कल्पना कीजिए, 2036 में झारखंड के किसी गाँव में किसान अपनी भाषा में बारिश की विश्वसनीय सूचना सुनता है.

क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) सिर्फ बड़े शहरों और रोबोटिक प्रयोगशालाओं तक सीमित है? या इसका असली भविष्य भारत के सुदूर गांवों, खेतों और छोटे अस्पतालों में छुपा है? जब आसमान में बादल घिरते हैं, तब एक गरीब किसान के मोबाइल पर उसकी अपनी संथाली या नागपुरी भाषा में आने वाला एक छोटा सा संदेश उसकी सालभर की मेहनत को उजड़ने से कैसे बचा लेता है? 24 सालों के प्रशासनिक जमीनी अनुभव और एआई पर आठ पुस्तकें लिख चुके वरिष्ठ आईएएस (IAS) अधिकारी डॉ. मनीष रंजन का उसी से हमारा परियच कराते हैं. तो चलिए जानते हैं AI कैसे ग्रामीण जीवन को आसान बना रहा है...

खेत तैयार है. बीज भी आ चुके हैं. लेकिन किसान के सामने एक ऐसा यक्ष प्रश्न खड़ा है जिसका जवाब गलत हुआ, तो पूरे मौसम की खून-पसीने की मेहनत पर पानी फिर सकता है. बुआई आज की जाए या बारिश का इंतजार किया जाए? 

आज के नए भारत में इस सवाल का जवाब केवल आसमान की ओर टकटकी लगाकर नहीं तलाशा जा रहा. साल 2025 में भारत सरकार ने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए 13 राज्यों के लगभग 3.88 करोड़ किसानों के मोबाइल पर एआई (AI) आधारित स्थानीय मानसून का सटीक पूर्वानुमान भेजा. यह सूचना केवल अंग्रेजी में नहीं, बल्कि किसानों की अपनी मातृभाषा हिंदी, ओड़िया, मराठी, बांग्ला और पंजाबी में सीधे उनके मोबाइल संदेशों (SMS) के जरिए पहुँचाई गई. देश के करोड़ों अन्नदाताओं के लिए यह मौसम का कोई सामान्य समाचार नहीं, बल्कि उनके पूरे साल की रोजी-रोटी का सबसे बड़ा संबल था.

मध्य प्रदेश और बिहार में हुए सरकारी सर्वेक्षणों में एक बेहद उत्साहजनक बात सामने आई. यहां 31 से 52 प्रतिशत किसानों ने स्वीकार किया कि इस मोबाइल संदेश (एआई पूर्वानुमान) को पाकर उन्होंने खेती से जुड़ा अपना निर्णय बदला. यह इस बात का सीधा प्रमाण है कि जब तकनीक सही समय पर, सही भाषा में और सही व्यक्ति तक पहुंचती है, तो वह केवल प्रयोगशाला का खिलौना नहीं रह जाती, बल्कि आम आदमी के जीवन को बदलने का जरिया बन जाती है.

 छोटे किसानों की तकदीर बदलने की वैश्विक होड़

दुनिया की सबसे बड़ी तकनीकी प्रयोगशालाओं में विकसित एआई का असली भविष्य शायद इसी छोटे से मोबाइल संदेश में छिपा है. सितंबर 2026 में गूगल और गेट्स फ़ाउंडेशन ने दक्षिण एशिया और अफ्रीका के छोटे किसानों के लिए एआई आधारित कृषि और जलवायु सूचना के विस्तार की एक बहुत बड़ी योजना की घोषणा की है. आज दुनिया के बड़े-बड़े वैज्ञानिक इस बात पर मंथन कर रहे हैं कि उस गरीब किसान तक नई तकनीक कैसे पहुँचे, जिसके पास न तो महंगे स्मार्टफोन हैं और न ही हर समय सलाह देने के लिए कोई कृषि विशेषज्ञ.

इस मामले में भारत दुनिया के अन्य देशों से बहुत आगे है. हमारे पास पहले से ही कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK), सरकारी डिजिटल प्लेटफॉर्मों और मोबाइल कनेक्टिविटी का एक मजबूत ढांचा मौजूद है.

तकनीक के दो बड़े भारतीय सिपाही

किसान ई-मित्र

 दिसंबर 2025 तक यह बहुभाषी डिजिटल मददगार 11 क्षेत्रीय भाषाओं में 93 लाख से अधिक किसानों की समस्याओं का समाधान कर चुका था.

राष्ट्रीय कीट निगरानी प्रणाली

यह प्रणाली 66 फसलों और 432 प्रकार के हानिकारक कीड़ों की पहचान कर 10,000 से अधिक कृषि विस्तार कर्मियों की मदद कर रही है.

 समझने वाली बात 

 किसी किसान को सिर्फ यह बताना कि ‘अगले सप्ताह बारिश होगी', काफी नहीं है. असली एआई वह है जो किसान के खेत की मिट्टी, बीज की किस्म और सिंचाई के साधनों को समझकर कस्टमाइज्ड (निजी) सलाह दे. इसलिए एआई हमारे कृषि वैज्ञानिकों का विकल्प नहीं, बल्कि उनके हाथों को मजबूत करने का जरिया है.

मैंने अपनी हालिया पुस्तक, ‘AI for Everyone: How AI Turns the Promise of Equality Into Reality—In Our Lifetime' में इसी बात को विस्तार से समझाया है कि तकनीक का असली मकसद ही यही है कि किसी भी बच्चे की शिक्षा, किसान की फसल और मरीज का इलाज उसके जन्मस्थान या गरीबी के कारण प्रभावित न हो.

अस्पताल की दूरी और समय पर 'एआई' का इलाज

अब जरा किसान के घर की दूसरी बड़ी जरूरत पर नजर डालते हैं स्वास्थ्य सेवा. गांव में अचानक किसी की तबीयत बिगड़ने पर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तो मिल जाता है, लेकिन विशेषज्ञ डॉक्टर शहर में होते हैं. जाँच में देरी का सीधा मतलब होता है बीमारी का जानलेवा हो जाना.

भारत की ई-संजीवनी (e-Sanjeevani) सेवा ने इस दिशा में कमाल का काम किया है. अप्रैल 2023 में इसमें एआई आधारित निर्णय-सहायता प्रणाली जोड़ी गई. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, नवंबर 2025 तक इसके जरिए रिकॉर्ड 28.2 करोड़ मरीजों को चिकित्सकीय परामर्श दिया जा चुका है. इसका मतलब यह नहीं कि रोबोट ने इलाज किया, बल्कि एआई ने डॉक्टरों को तुरंत और सटीक निर्णय लेने में मदद की.

इसी तरह, 'मधुनेत्रएआई' (Madhunetra AI) नाम का उपकरण मधुमेह (Diabetes) के मरीजों की आँखों के रेटिना की तस्वीरों की जाँच कर अंधेपन के खतरे को समय रहते पहचान लेता है. दिसंबर 2025 तक 11 राज्यों के 38 केंद्रों पर इसके जरिए 14,000 से अधिक आँखों की जाँच की जा चुकी है.

लेकिन एक प्रशासनिक अधिकारी के रूप में जिला स्तर पर काम करते हुए मैंने सीखा है कि सिर्फ मशीन से जांच काफी नहीं है. असली चुनौती यह है कि जांच के बाद मरीज को दवा मिली या नहीं, उसे बड़े अस्पताल रेफर किया गया या नहीं और उसका सही फॉलो-अप हुआ या नहीं. एआई की असली सफलता सिर्फ हाई-टेक मशीन में नहीं, मरीज के ठीक होकर घर लौटने में है.

 बैंक लोन: आसान कर्ज और भरोसे का नया रिश्ता

खेती हो या बीमारी का आकस्मिक खर्च, ग्रामीण जीवन की तीसरी सबसे बड़ी जरूरत है. पैसा (फाइनेंस). हमारे छोटे किसानों या रेहड़ी-पटरी वालों के पास सैलरी स्लिप या पुराना सिबिल (CIBIL) स्कोर नहीं होता. ऐसे में बैंकों से कर्ज मिलना नामुमकिन हो जाता है. लेकिन एआई तकनीक उनके रोजमर्रा के छोटे-मोटे वित्तीय लेनदेन के व्यवहार को समझकर उनकी विश्वसनीयता तय कर सकती है और उन्हें बिना कागजी झंझट के आसान लोन दिला सकती है.

भारत में जनधन, आधार और यूपीआई (UPI) की तिकड़ी ने पहले ही करोड़ों गरीबों को मुख्यधारा की बैंकिंग से जोड़ा है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की अगस्त 2025 की FREE-AI समिति रिपोर्ट ने भी इसके लिए 26 बेहतरीन सिफारिशें दी हैं. इस रिपोर्ट का मूल मंत्र यही है कि बैंकों में एआई का उपयोग पूरी पारदर्शिता, जवाबदेही और मानवीय संवेदनाओं के साथ होना चाहिए ताकि किसी भी गरीब के साथ नाइंसाफी न हो.

तीन सरकारी विभाग नहीं, यह एक परिवार की जिंदगी है!

सरकारी फाइलों में कृषि, स्वास्थ्य और बैंकिंग भले ही अलग-अलग विभाग हों, लेकिन गाँव के किसी गरीब परिवार के लिए ये उसकी जिंदगी के आपस में जुड़े हुए हिस्से हैं. मानसून खराब हुआ तो जेब खाली हुई (कृषि), जेब खाली हुई तो बीमारी का इलाज छूटा (स्वास्थ्य) और समय पर मदद न मिली तो कर्ज का जाल बढ़ गया (बैंकिंग). इसलिए हमें एआई की सफलता को सरकारी ऐप्स की संख्या से नहीं, बल्कि एक ग्रामीण परिवार के जीवन में आए सुधार से मापना होगा.

मैंने अपने 24 सालों के प्रशासनिक सफर में, विशेष रूप से आदिवासी और पिछड़े क्षेत्रों में काम करते हुए यही सीखा है कि नीतियों की असली परीक्षा दिल्ली या रांची जैसे बड़े शहरों में नहीं, बल्कि दूर-दराज की पंचायतों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और ब्लॉक ऑफिसों में होती है. वहां आम नागरिक यह नहीं पूछता कि सॉफ्टवेयर कितना एडवांस है, वह पूछता है- मेरी समस्या का हल कैसे होगा और मुसीबत में मेरी बात कौन सुनेगा?

इसीलिए लोकर लैंग्वेज केवल अनुवाद का जरिया नहीं हैं. संथाली, हो, मुंडारी या नागपुरी भाषा में किया गया एक आत्मीय संवाद ही जनता का प्रशासन और तकनीक पर भरोसा मजबूत कर सकता है.

 यूपीआई (UPI) से एआई (AI) तक: भारत का स्वर्णिम भविष्य

भारत ने दुनिया को यूपीआई (UPI) जैसी डिजिटल क्रांति देकर साबित किया है कि हम तकनीक को जन-जन तक पहुंचाने में माहिर हैं. अपनी दूसरी पुस्तक ‘Artificial Intelligence: Concepts and Applications' में मैंने चर्चा की है कि कैसे आधार, यूपीआई और डिजिलॉकर जैसी हमारी डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) पर अब एआई के नए और क्रांतिकारी अनुप्रयोग खड़े किए जा रहे हैं.

हमारी ताकत सिर्फ अमेरिका या चीन की तरह बड़े एआई मॉडल बनाना नहीं है. हमारी असली ताकत यह है कि हम एक ऐसी संवेदनशील व्यवस्था बना रहे हैं जहाँ झारखंड के किसी सुदूर गांव में बैठा किसान अपनी संथाली भाषा में मौसम का सटीक हाल सुन सके, उसकी बुजुर्ग माँ की आँखों की बीमारी का समय पर पता चल सके और उसकी खेती के लिए बिना दलालों के सीधे बैंक से लोन मिल सके.

यही भारत की असली तकनीकी उड़ान होगी. जब दुनिया हमारे वैज्ञानिकों की तारीफ करे, और हमारे देश का सबसे गरीब नागरिक उस तकनीक का सुख अपने दैनिक जीवन में महसूस करे.

(लेखक- डॉ. मनीष रंजन भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी और AI पर आठ पुस्तकों के लेखक हैं, जिनमें ‘AI for Everyone' और ‘Artificial Intelligence: Concepts and Applications' शामिल हैं. प्रधानमंत्री पुरस्कार और राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस पुरस्कार से सम्मानित डॉ. रंजन ने यूसी बर्कले के गोल्डमैन स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के सैड बिजनेस स्कूल से पढ़ाई की है. लेख में व्यक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं.) 

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