"मुझे मैथ्स नहीं आती", "मैथ्स बहुत मुश्किल है", "मैं ये सवाल नहीं कर सकता", अगर बच्चा अक्सर ऐसी बातें कहता है, तो घबराने की जरूरत नहीं है. मैथ्स से डरना या उसमें रुचि न होना कई बच्चों में सामान्य बात है. हालांकि अगर समय रहते इस समस्या पर ध्यान न दिया जाए, तो इसका असर बच्चे के आत्मविश्वास और पढ़ाई, दोनों पर पड़ सकता है.
ऐसे 7 आसान टिप्स, जिनकी मदद से बच्चे को पढ़ाएं मैथ्स
1. पहले समझें कि बच्चा मैथ्स से भाग क्यों रहा है
हर बच्चे के मैथ्स से दूरी बनाने की वजह एक जैसी नहीं होती. कुछ बच्चों को सवाल कठिन लगते हैं, कुछ एक-दो बार कम अंक आने के बाद आत्मविश्वास खो देते हैं, जबकि कई बच्चे क्लास में कॉन्सेप्ट समझ नहीं पाते. इसलिए सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि समस्या डर की है, समझ की है या रुचि की. जब असली वजह पता चलेगी, तभी सही समाधान मिल पाएगा.
2. मैथ्स को किताबों से बाहर निकालिए
अगर मैथ्स सिर्फ कॉपी और किताब तक सीमित रहेगा, तो बच्चा उसे बोझ समझेगा. खरीदारी के समय बिल जोड़ना, क्रिकेट मैच में स्ट्राइक रेट निकालना, घर का बजट बनाना या खाना बनाते समय माप-तौल कराना, ये सभी गतिविधियां बच्चे को यह एहसास दिलाती हैं कि मैथ्स असल जिंदगी का हिस्सा है, सिर्फ परीक्षा का विषय नहीं.
3. हर सवाल का जवाब तुरंत मत बताइए
अक्सर माता-पिता बच्चे के अटकते ही पूरा हल बता देते हैं. इससे बच्चे की सोचने की क्षमता विकसित नहीं हो पाती. उसकी जगह ऐसे सवाल पूछिए जो उसे खुद समाधान तक पहुंचने में मदद करें. जब बच्चा अपने दम पर जवाब खोजता है, तो उसका आत्मविश्वास भी बढ़ता है.
4. अंक नहीं, प्रगति को सेलिब्रेट करें
अगर बच्चा पहले 20 में से 5 सवाल सही करता था और अब 10 करने लगा है, तो यह भी बड़ी उपलब्धि है. हर बार 100 में 100 अंक की उम्मीद करने के बजाय उसकी छोटी-छोटी प्रगति की सराहना करें. इससे पढ़ाई का दबाव कम होगा और सीखने का उत्साह बढ़ेगा.
5. स्क्रीन टाइम कम, ब्रेन टाइम ज्यादा
लगातार मोबाइल और शॉर्ट वीडियो देखने से बच्चों का ध्यान कम समय के लिए केंद्रित रहता है. गणित जैसे विषय में धैर्य और एकाग्रता दोनों की जरूरत होती है. इसलिए स्क्रीन टाइम सीमित करें और उसकी जगह पजल, सुडोकू, रूबिक क्यूब या लॉजिक गेम्स जैसी गतिविधियां शामिल करें.
6. गलतियों को सीखने का हिस्सा बनाइए
अगर बच्चा किसी सवाल में गलती करता है, तो सिर्फ सही उत्तर बताकर आगे न बढ़ें. उसके साथ बैठकर समझिए कि गलती कहां हुई. जब बच्चा अपनी गलती का कारण समझता है, तो वही गलती दोबारा होने की संभावना काफी कम हो जाती है.
7. जरूरत पड़े तो पढ़ाने का तरीका बदलें
हर बच्चा एक जैसा नहीं सीखता. कुछ बच्चों को चित्र देखकर समझ आता है, कुछ को वीडियो से और कुछ को गतिविधियों के जरिए. अगर पारंपरिक तरीके से फायदा नहीं हो रहा है, तो टीचर से बात करें या ऐसा तरीका अपनाएं जो बच्चे की सीखने की शैली के अनुकूल हो. कई बार पढ़ाई का तरीका बदलने से ही मैथ्स आसान लगने लगती है.
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