आर्थिक राष्ट्रवाद के विचार को बढ़ावा देने का आह्वान किया उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़

उन्होंने देश व्यापार जगत और उद्योगजगत के लोगों का आवाहन करते हुए कहा कि आर्थिक राष्ट्रवाद को ये लोग मिलकर बढ़ावा दें. उन्होंने ट्वीट में लिखा, अजीब लगता है, जब पतंग और दीया जैसी चीजें भी बाहर से आती हैं.

आर्थिक राष्ट्रवाद के विचार को बढ़ावा देने का आह्वान किया उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़

उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़

नई दिल्ली:

देश के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने आज आर्थिक राष्ट्रवाद का आह्वान किया है. उन्होंने देश व्यापार जगत और उद्योगजगत के लोगों का आवाहन करते हुए कहा कि आर्थिक राष्ट्रवाद को ये लोग मिलकर बढ़ावा दें. उन्होंने ट्वीट में लिखा, अजीब लगता है, जब पतंग और दीया जैसी चीजें भी बाहर से आती हैं. इस ट्वीट में उन्होंने सवाल पूछा कि जो चीज यहां बन सकती है, क्या वो बाहर से आनी चाहिए. उनका दूसरा प्रश्न यह है कि हमारी प्रतिभा में कहां कमी है. यही कहने के बाद उन्होंने व्यापारियों और उद्योगपतियों से आह्वान किया कि ये लोग आर्थिक राष्ट्रवाद के विचार को बढ़ावा दें.

गौरतलब है कि आर्थिक राष्ट्रवाद किसी देश में तब कहलाता है जब वह देश अपने अर्थतंत्र में श्रमशक्ति और पूंजी निर्माण में घरेलू नियंत्रण पर बल देता है. इसके अलावा जरूरत पढ़ने पर टैक्स लगाने और पाबंदियां लगाने से भी नहीं हिचकता है. यह भी कहा जा सकता है कि आर्थिक राष्ट्रवाद फ्री ट्रेड का विरोधी है. इसे वैश्वीकरण का विरोधी भी कहा जा सकता है. आर्थिक राष्ट्रवाद स्वदेशी उत्पादों को संरक्षण प्रदान करता है. साथ ही इस बढ़ावा देने के अन्य रास्ते भी तैयार किए जा सकते हैं.  

उल्लेखनीय है कि कुछ दिन पहले केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने भी कहा था कि भारत और दक्षिण कोरिया के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट भारत पर आर्थिक रूप से विपरीत असर कर रहा है. उन्होंने कहा कि भारत में किया और हुंदै जैसी आटोमोबाइल कंपनियां अच्छा कारोबार कर रही हैं क्योंकि रियायती कर व्यवस्था लागू होती है जबकि भारत के बने उत्पाद दक्षिण कोरिया में ज्यादा कारोबार नहीं पा रहे हैं. इसके पीछे दक्षिण कोरिया के लोगों का मजबूत आर्थिक राष्ट्रवाद वजह है. दक्षिण कोरिया के लोग अपने देश में निर्मित उत्पादों पर ज्यादा निर्भर हैं और वे उसे ही खरीदना पसंद करते हैं. उनका कहना है कि यह वैश्वीकरण के युग में देश के नागरिकों के ऊपर निर्भर करता है कि वे क्या बनना चाहते हैं. निर्माता या उपभोक्ता.
कहा जा सकता है कि यही कारण है कि चीन जैसे देश के लोग उपभोक्ता बनने के बजाय निर्माता बनने में यकीन करते हैं. साथ ही वे अपने लोगों के लिए सस्ता उत्पाद तैयार करते हैं. 

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अगर चीन, दक्षिण कोरिया, जापान और अमेरिका, यूरोप, भारत की आबादियों की तुलना की जाए तो यह पाया जाएगा कि वे उत्पादक बनने में गर्व महसूस करते हैं. इसी के साथ वे प्रयास करते हैं कि वे अपने ही देश के छोटे कारोबारियों से सामान लें भले ही वह उन्हें कुछ महंगा पड़ रहा हो वहीं, भारत समेत यूरोप और अमेरिका के लोगों में उपभोक्ता बनने की प्रवृत्ति ज्यादा हो गई है और ये लोग सस्ते सामना पर ही ध्यान केंद्रिय किए रहते हैं. इसलिए ऐसे देश के लोगों के भीतर जो अपने देश के उत्पादों के प्रति लगाव न होने की भावना है यह देश के लिए आर्थिक रूप से खतरा बन रही है. यही कारण है कि निर्माण क्षेत्र में बेरोजगारी भी बढ़ती है.