खास बातें
- वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने चिंता जताई कि पश्चिम एशिया में जारी राजनीतिक संकट से बढ़ती तेल कीमतों का गंभीर नीतिगत असर होगा।
New Delhi: वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने चिंता जताई कि पश्चिम एशिया में जारी राजनीतिक संकट से बढ़ती तेल कीमतों का गंभीर नीतिगत असर होगा, लेकिन उन्होंने साथ ही विश्वास जताया कि हालात से निपट लिया जाएगा। भारत को अपनी जरूरत का दो-तिहाई कच्चा तेल विदेश से मंगाना पड़ता है। ऐसे में इसकी कीमतों में उछाल सरकार के लिए बुरी खबर ही माना जाएगा, क्योंकि उसे स्थिति से निपटने के लिए सब्सिडी पर अधिक खर्च बढ़ाने या उपभोक्ताओं पर दाम का बोझ बढ़ाने का अलोकप्रिय निर्णय करने जैसे दो कठिन विकल्पों की बीच चुनाव करना होगा। मुखर्जी ने रिजर्व बैंक बोर्ड की बैठक के बाद संवाददाताओं से कहा, विश्व अर्थव्यवस्था की हालत में धीमे सुधार, पश्चिम एशिया तथा उत्तरी अफ्रीका में राजनीतिक उठापटक से उपजी अनिश्चितता भारतीय नीति निर्धारकों के लिए गंभीर चुनौतियां खड़ी कर सकती है। उल्लेखनीय है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 116 डॉलर प्रति बैरल की ऊंचाई को छू गई हैं। वित्त मंत्रालय ने 2011-12 में तेल सब्सिडी मद में खर्च 23,640 करोड़ रुपये रहने का अनुमान लगाया है, जबकि मौजूदा वित्तवर्ष में इस मद पर 38,386 करोड़ रुपये खर्च का प्रावधान किया गया है। कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती रहीं, तो सरकार को सब्सिडी पर और अधिक धन खर्च करना होगा। भारत का तेल आयात जनवरी में 7.8 प्रतिशत बढ़कर 7.85 अरब डॉलर हो गया, जिससे अप्रैल-जनवरी 2010-11 में आयात बिल बढ़कर 79.95 अरब डॉलर रहा। मुखर्जी ने कहा, मैं आपको आश्वासन दिलाना चाहूंगा कि रिजर्व बैंक के साथ परामर्श कर हम इस चुनौती का सामना कर लेंगे...यह मुझे विश्वास है। विश्व अर्थव्यवस्था के बारे में उन्होंने कहा कि अमेरिका जैसे विकसित देशों की अर्थव्यवस्था का हाल सुधर रहा है पर आयरलैंड, स्पेन और पुर्तगाल जैसे यूरो क्षेत्र के कुछ देशों की सरकारों के पास ऋण चुकाने के लिए धन का संकट है। मुखर्जी ने कहा कि देखना यह है कि इन देशों के ऋण संकट का यूरोप के अन्य देशों पर कैसा असर पड़ता है। मुखर्जी ने कहा कि यूरोप की तीव्र अर्थिक वृद्धि खुद भारत के लिए जरूरी है।