यह ख़बर 06 मार्च, 2011 को प्रकाशित हुई थी

ओएनजीसी खो देगी नवरत्न कंपनी का दर्जा

खास बातें

  • ओएनजीसी अगले महीने 11,500 करोड़ रुपये का एफपीओ लाने की जल्दबाजी में नवरत्न कंपनी का दर्जा और वित्तीय स्वायत्तता से हाथ धो बैठेगी।
नई दिल्ली:

तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम (ओएनजीसी) अगले महीने 11,500 करोड़ रुपये का अनुवर्ती सार्वजनिक निर्गम (एफपीओ) लाने की जल्दबाजी में नवरत्न कंपनी का दर्जा और वित्तीय स्वायत्तता से हाथ धो बैठेगी। एफपीओ लाने से पहले सरकार ने सेबी के सूचीबद्धता नियमों को पूरा करने के लिए अपने दो निदेशकों को ओएनजीसी बोर्ड से वापस बुलाने की योजना बनाई है। ऐसा कर सरकार कंपनी निदेशक मंडल में 50 प्रतिशत स्वतंत्र निदेशकों के मानदंड को पूरा कर सकेगी और कंपनी को 5 अप्रैल को 11,500 करोड़ रुपये का एफपीओ लाने की अनुमति मिल जाएगी। कंपनी का एफपीओ तो आ जाएगा लेकिन कंपनी के बोर्ड से सरकारी निदेशकों को वापस बुलाए जाने से ओएनजीसी नवरत्न का दर्जा खो देगी। नवरत्न दर्जा प्राप्त कंपनी के निदेशक मंडल को कंपनी परियोजनाओं में निवेश की मंजूरी देने और किसी संयुक्त उद्यम में 1,000 करोड़ रुपये तक के निवेश की मंजूरी देने की स्वतंत्रता होती है। वास्तव में ओएनजीसी को तो इससे भी बड़ा महारत्न का दर्जा मिला हुआ था लेकिन कंपनी ने इस बड़े दर्जे का इस्तेमाल ही नहीं किया। इसके लिए कंपनी निदेशक मंडल में कार्यकारी और गैर-कार्यकारी निदेशकों की संख्या बराबर होनी चाहिए थी। महारत्न दर्जा प्राप्त कंपनियों को अपनी परियोजनाओं में बड़ा निवेश करने और संयुक्त उद्यमों में 5,000 करोड़ रुपये और नेटवर्थ का 15 प्रतिशत जो भी अधिक हो निवेश करने की अनुमति होती है। बहरहाल, नियमों के मुताबिक, एक नवरत्न बोर्ड इन अधिकारों का इस्तेमाल तभी कर सकता है जब उसके बोर्ड में सरकार द्वारा नामित निदेशक शामिल हों। ऐसे निदेशकों को वापस बुलाने पर ओएनजीसी को 100 करोड़ रुपये से अधिक के खर्च के लिए भी सार्वजनिक निवेश बोर्ड की मंजूरी लेनी पड़ेगी। पेट्रोलियम मंत्रालय के स्तर समय पर कदम नहीं उठाए जाने के कारण यह स्थिति बनी है। ओएनजीसी बोर्ड में स्वतंत्र निदेशकों को नामित करने में मंत्रालय ने बड़ी गलती की जिससे यह स्थिति पैदा हुई।


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