शीर्ष अदालत ने मामले को मनी बिल को लेकर पहले से संविधान पीठ में चल रहे मामलों के साथ टैग कर दिया है और कहा है कि यह मुद्दा संविधान पीठ द्वारा विचार के योग्य है. कोर्ट ने इसे लेकर केंद्र से चार हफ्ते में जवाब मांगा है.
मामले की सुनवाई में जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि IPO मामलों में अदालत को अंतरिम राहत देने में अनिच्छुक होना चाहिए. मनी बिल का मामला 2020 में संविधान पीठ को भेजा गया है. फैसला सात जजों की बेंच को सुनवाई कर तय करना है, इसलिए हम इस मामले में नोटिस जारी कर इसे मामले के साथ टैग करेंगे. हम इस मामले मे किसी तरह का अंतरित राहत का आदेश जारी नहीं कर सकते.
इसपर जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस पी एस नरसिम्हा की बेंच ने सुनवाई की.
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क्या है याचिकाकर्ता की दलील?
याचिकाकर्ता की ओर से पेश इंदिरा जयसिंह ने कहा कि पहले LIC का सारा सरप्लस पहले पॉलिसीहोल्डर्स को जाता था. इस संशोधन से पहले 95 फीसदी सरप्लस पॉलिसी होल्डर्स को और पांच फीसदी केंद्र सरकार के लिए जाता था. इस मनी बिल के जरिए संशोधन करके पॉलिसीहोल्डर्स का हिस्सा शेयरहोल्डर्स को दे दिया गया है. तीसरे पक्ष का अधिकार बना दिया गया है. 4 मई को ही IPO खुला है. अब अलॉटमेंट शुरू होना है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट किसी तरह की अंतरिम राहत दी जानी चाहिए, जिन लोगों ने एप्लाई किया है, उनके हित को बचाते हुए ये राहत दी जाए.
इंदिरा जयसिंह ने दलील दी कि ये तो जनता का पैसा है जिसे बहुत चालाकी से LIC कंपनी का धन बनाया जा रहा है. पॉलिसीधारकों का पैसा अब शेयर धारकों को दिया जाएगा. ऐसे में IPO के लिए निवेश किया गया रुपया अकाउंट में ही हॉल्ट किया जाए.
केंद्र का क्या कहना है?
केंद्र सरकार ने इसका विरोध किया है और कहा कि यह देश का सबसे बड़ा IPO है. अभी तक 73 लाख सब्सक्रिप्शन हो चुके हैं. 900 रुपये का शेयर प्राइस है. 4 मई से ही IPO शुरू हुआ है. मद्रास हाईकोर्ट इस पर फैसला दे चुका है और बॉम्बे हाईकोर्ट भी इनकार कर चुका है. 2021 में ये मनी बिल पास हुआ, ये लोग 15 महीने तक इंतजार करते रहे और अब ये अंतरिम राहत की मांग लेकर आ गए. जो यहां चुनौती दे रहे हैं वो 15 हजार रुपये के पॉलिसी होल्डर्स हैं, जो नुकसान होगा उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
केंद्र ने कहा कि कोई ऐसा कांट्रैक्ट नहीं है जो कहता है कि उन्हें 95 फीसदी में हिस्सा मिलेगा. पॉलिसी होल्डर्स को सरप्लस के हिस्से में कोई वैधानिक अधिकार नहीं है. इस मामले में कोई अंतरिम राहत नहीं दी जानी चाहिए. इससे बाजार में गलत संदेश जाएगा.
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क्या है पूरा मामला?
सुप्रीम कोर्ट इस मामले में दाखिल जनहित याचिकाओं और मद्रास और बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसलों के खिलाफ अपीलों
पर सुनवाई कर रहा था. इनमें केंद्र सरकार के फैसले को चुनौती दी थी कि वह जीवन बीमा निगम (LIC) में अपनी 5 प्रतिशत हिस्सेदारी का व्यापार एक प्रारंभिक सार्वजनिक पेशकश के माध्यम से करेगा. याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह LIC के सरप्लस के हिस्से को कम कर देगा जिसका याचिकाकर्ता कानूनी रूप से हकदार है. सरकार के इस फैसले से पॉलिसीधारकों को 4,14,919 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है.
याचिका में कहा गया है कि हाईकोर्ट इस बात पर विचार करने में विफल रहा कि LIC अधिनियम, 1956 के पारित होने के बाद पहली बार, ऐसा संशोधन किया गया है जो भारत की समेकित या आकस्मिक निधि में से अनुच्छेद 110 के तहत वित्त अधिनियम के माध्यम से 'धन विधेयक' 'मनी बिल' के रूप में पारित किया गया है, जबकि इसका किसी भी टैक्स लगाने, उसमें छूट देने, परिवर्तन करने और नियंत्रण करने या रुपये से कोई संबंध नहीं है.
थॉमस फ्रेंको राजेंद्र देव द्वारा दायर की गई मुख्य याचिका में कहा गया है कि LIC अधिनियम की धारा 5 उस सीमा तक शून्य और निष्क्रिय घोषित किया जाए जहां तक निगम की पूंजी को 'इक्विटी पूंजी' घोषित किया गया है. वित्त अधिनियम की धारा 130, 131, 134 और 140 और LIC अधिनियम की धारा 4, 5, 24 और 28 शून्य और निष्क्रिय हैं. वित्त अधिनियम, 2021 का भाग III मनी बिल के रूप में प्रमाणन के लिए प्रारंभ से ही शून्य है. केंद्र सरकार को निर्देश दिया जाए कि LIC के IPO को आगे नहीं बढ़ाया जाए.
बता दें कि पिछले महीने बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी LIC द्वारा IPO के जरिए शेयर जारी करने के लिए दाखिल किए गए ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (DRHP) पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था. याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि आवंटन या आरक्षण तुरंत प्रत्येक पॉलिसीधारक को निगम के सरप्लस में एक संपत्ति देता है.
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