बड़े पैमाने पर सुधारों की गुंजाइश, विकास दर 8% से ज्यादा रहने का अनुमान : आर्थिक सर्वे

नई दिल्ली:

बजट से एक दिन पहले संसद में पेश आर्थिक सर्वे में साल 2015-16 में अर्थव्यवस्था में सुधार का दावा किया गया है। सर्वे के मुताबिक, आर्थिक हालात बेहतर हो रहे है और साल 2015-16 में जीडीपी की विकास दर 8.1-8.5% रहने की उम्मीद है। सर्वे में विकास दर के 10% तक पहुंचने की संभावना जताई गई है और निवेशकों का भरोसा हासिल करने के लिए कोयला, बीमा और भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव को ज़रूरी बताया गया है।

सर्वे में वित्तीय और राजस्व घाटे में कटौती के लिए खर्च पर लगाम लगाने का सुझाव भी शामिल है और इसके लिए गैस , केरोसिन, खाद और खाद्यान्न पर जारी सब्सिडी की बर्बादी रोकने की बात कही गई है।

सर्वे के मुताबिक अगर तेल, खाद्य और खाद सब्सिडी अगर सही तरीके से गरीब ज़रूरतमंदों तक पहुंचता है तो इससे सब्सिडी की बर्बादी रोकी जा सकती है और बचे हुए फंड्स का इस्तेमाल कृषि क्षेत्र में नए निवेश के लिए किया जा सकता है।

सर्वे में दावा किया गया है कि साल 2014-15 में अनाज उत्पादन बीते 5 साल के औसत से 85 लाख टन ज्यादा रहने की उम्मीद है...यानी नए साल में मंडियों में अनाज औसत से ज्यादा रहेगा जिसकी वजह से महंगाई मियंत्रित करना आसान होगा। कृषि विकास दर के घट कर  1.1% रहने का अनुमान है, जबकि मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज़ में तेज़ी की उम्मीद जताई गई है। इस साल चालू खाते का घाटा 1% तक लाने की बात कही गई है और टेलीकॉम स्पैक्ट्रम, कोल ब्लॉक बिक्री से बेहतर कमाई की उम्मीद जताई गयी है।

विपक्ष ने आर्थिक विकास दर में बढ़ोतरी के दावों को खोखला बताया है। सीपीएम नेता सीताराम येचूरी ने एनडीटीवी से कहा कि सरकार ने आर्थिक विकास दर का आंकलन नए तरीके से किया है जिसकी वजह से ग्रोथ रेट काफी ज्यादा दिखाया गया है। उनका आरोप है कि ये आंकड़ों की बाज़ीगरी है और ज़मीन पर सच्चाई कुछ और ही है। येचूरी ने दावा किया कि पिछले कुछ साल में खेती के लिए इस्तेमाल की जाने वाली ज़मीन में गिरावट दर्ज हुई है और किसान परेशान हैं। जबकि कांग्रेस सांसद राजीव शुक्ला ने कहा कि पुराने आंकलन के हिसाब से संभावित आर्थिक विकास दर 6 पीसदी होनी चाहिये 8 या 8.5 फीसदी नहीं।

सर्वे में यह भी कहा गया है कि आर्थिक सुधारों को लागू करने के लिए सरकार के पास संख्या बल है, जो किसी भी तरह के बड़े सुधारों के लिए जरूरी होता है। लेकिन सवाल है कि जब से एनडीए सरकार सत्ता में आई है उसका आर्थिक सुधार का एजेंडा अटका पड़ा है।

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राज्य सभा में विपक्ष के विरोध की वजह से सरकार आर्थिक सुधार से जुड़े कई अहम विधेयकों पर सरकार आगे नहीं बढ़ पा रही है। ऐसे में 'बिग-बैंग' रिफार्म्स आगे बढ़ाना सरकार के लिए आने वाले समय में मुश्किल चुनौती साबित हो सकता है।