यह ख़बर 08 नवंबर, 2012 को प्रकाशित हुई थी

कैबिनेट के फैसले से महंगे होंगे कॉल रेट

खास बातें

  • भारत में टेलिकॉम सुविधाएं महंगी हो सकती हैं क्योंकि कैबिनेट का बुधवार को फैसला टेलिकॉम कंपनियों पर 31 हजार करोड़ का बोझ डाल सकता है। हो सकता है कि कंपनियां इस बोझ को ग्राहकों के सिर मढ़ दें।
नई दिल्ली:

भारत में टेलिकॉम सुविधाएं महंगी हो सकती हैं क्योंकि कैबिनेट का बुधवार को फैसला टेलिकॉम कंपनियों पर 31 हजार करोड़ का बोझ डाल सकता है। हो सकता है कि कंपनियां इस बोझ को ग्राहकों के सिर मढ़ दें।

कैबिनेट ने तय किया है कि जिन टेलिकॉम कंपनियों के पास 4.4 मेगाहर्ट्ज तक स्पेक्ट्रम है उन्हें स्पेक्ट्रम फीस नहीं देना होगी, लेकिन जिन टेलिकॉम कंपनियों के पास 4.4 मेगाहर्ट्ज से ज़्यादा स्पेक्ट्रम है उन्हें एक बार स्पेक्ट्रम फीस देनी होगी। इसमें भारती, वोडाफोन, आइडिया और बीएसएनएल जैसी कंपनियां शामिल हैं।

इन कंपनियों को ये फ़ीस 1 जनवरी 2013 से देनी होगी। जिन कंपनियों के पास 2008 में 6.2 मेगाहर्ट्ज से ज़्यादा स्पेक्ट्रम था उन्हें जुलाई 2008 से 31 दिसंबर 2012 तक करीब 3000 करोड़ देना होगा।

सरकार को उम्मीद है कि इस फैसले से 31 हजार करोड़ की कमाई होगी। लेकिन टेलिकॉम कंपनियों से फीस वसूलने का सीधा मतलब है कि उन पर बोझ पड़ेगा। लेकिन क्या टेलिकॉम कंपनियां इस वक्त ये बोझ उठा सकती हैं।

कहीं इस फैसले से उपभोक्ताओं पर तो बोझ नहीं बढ़ेगा टेलिकॉम मंत्री कपिल सिब्बल की दलील है कि उपभोक्ताओं पर कोई बोझ नहीं पड़ेगा और कंपनियों का प्रोफिट भी बढ़ेगा। लेकिन टेलिकॉम कंपनियां सरकार के इस दावे को सही नहीं मानतीं, उनकी दलील है कि वन टाइम स्पेक्ट्रम फीस से उनका ऑपरेशनल खर्च काफी बढ़ जाएगा।

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इस फैसले से सरकार को तो फायदा होगा लेकिन आम आदमी की जेब ढीली होगी।  निजी कंपनियों ने ये साफ कर दिया है कि वे इस अतिरिक्त वित्तीय बोझ को उठाने में सक्षम नहीं हैं और उन्हें ये बोझ उपभोक्ताओं पर डालना होगा। यानि आपकी फोन कॉल्स आने वाले समय में महंगी हो सकती हैं।