हिंदी सिनेमा की कई फिल्मों के डायलॉग आज भी लोगों की जुबान पर हैं. पर्दे पर कलाकारों की दमदार अदाकारी के साथ जब ये संवाद सुनाई देते हैं तो सिनेमाघर तालियों से गूंज उठते हैं. हालांकि, इन यादगार डायलॉग्स को लिखने वाले लेखक अक्सर गुमनाम ही रह जाते हैं. ऐसे ही एक दिग्गज थे वजाहत मिर्जा, जिन्होंने 50 और 60 के दशक में हिंदी फिल्मों को कई अमर संवाद दिए. ‘मुगल-ए-आजम' और ‘मदर इंडिया' जैसी क्लासिक फिल्मों से उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई. उनकी लेखनी का असर ऐसा था कि उनका नाम ऑस्कर तक पहुंचा. उनकी डेथ एनिवर्सरी पर जानते हैं उनके जीवन और करियर से जुड़ी खास बातें.
ऑस्कर तक पहुंचाने वाली फिल्म बनी ‘मदर इंडिया'
वजाहत मिर्जा का जन्म 20 अप्रैल 1908 को उत्तर प्रदेश के इस्लामपुर गांव में हुआ था. पढ़ाई पूरी करने के बाद उनका रुझान फिल्मों की ओर बढ़ा और उन्होंने 1933 में फिल्म ‘यहूदी की लड़की' से बतौर लेखक अपने करियर की शुरुआत की. इसके बाद उन्होंने ‘हम तुम और वो', ‘वतन', ‘औरत', ‘रोटी', ‘लाल हवेली', ‘एक ही रास्ता', ‘मदर इंडिया' और ‘मुगल-ए-आजम' जैसी फिल्मों के संवाद लिखे. 1957 में रिलीज हुई ‘मदर इंडिया' ऑस्कर के बेस्ट इंटरनेशनल फीचर फिल्म (तत्कालीन विदेशी भाषा फिल्म) श्रेणी में नामांकित हुई थी. इस उपलब्धि के साथ वजाहत मिर्जा उन पहले भारतीय स्क्रीनराइटरों में शामिल हुए, जिनका काम ऑस्कर तक पहुंचा.
‘मुगल-ए-आजम' के डायलॉग्स ने बनाई अलग पहचान
1960 में आई ‘मुगल-ए-आजम' वजाहत मिर्जा के करियर की सबसे बड़ी फिल्मों में गिनी जाती है. फिल्म के कई संवाद आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार डायलॉग्स में शामिल किए जाते हैं. उनकी शानदार लेखनी के लिए उन्हें बेस्ट डायलॉग राइटर का सम्मान भी मिला. सिर्फ लेखक ही नहीं, उन्होंने निर्देशक के रूप में भी काम किया. 1945 में उन्होंने ‘प्रभु का घर' का निर्देशन किया, जिसे अच्छी सफलता मिली. अपने फिल्मी सफर में उन्होंने कुल पांच फिल्मों का निर्देशन किया.
भारत में मिली शोहरत, पाकिस्तान में बीते आखिरी दिन
वजाहत मिर्जा ने भारतीय फिल्म उद्योग में लंबा और सफल सफर तय किया. बाद के वर्षों में उन्होंने फिल्मों से दूरी बना ली और अपने परिवार के पास पाकिस्तान चले गए. उनके भाई मुर्तजा पहले से वहीं रह रहे थे और फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े थे. वहीं रहते हुए वजाहत मिर्जा ने अपने जीवन का अंतिम समय बिताया. 4 अगस्त 1990 को पाकिस्तान में उनका निधन हो गया. आज भी हिंदी सिनेमा के इतिहास में उनका नाम उन चुनिंदा लेखकों में लिया जाता है, जिन्होंने अपनी कलम से फिल्मों को हमेशा के लिए यादगार बना दिया.
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