भारतीय संस्कृति अलग अलग रंगों से सजी है. जिस तरह जगह-जगह पर बोली-भाषा बदलती है. उसी तरह रीति-रिवाज और तीज-त्योहार भी बदल जाते हैं. शादी-ब्याह और इनमें निभाए जाने वाली रस्में और गीत-संगीत भी बदल जाता है. आज हम आपको एक ऐसे पारंपरिक भोजपुरी/मैथिवी विवाह गीत के बारे में बताएंगे जो कि जेठ के लिए लिखा गया है. इसे कुमारी सोनल और अशकंदानी ने गाया है और संगीत सुशांत अस्थाना का है. इस गाने के बोल पारंपरिक हैं और कुछ ऐसे हैं कि एक बार आप सुन लें तो दिमाग में चढ़ जाएं.
गाने का मतलब और इसमें क्या कहा जा रहा है
गाने में आप एक शब्द सुनते हैं “भसुर” या “भासुर” इसका मतलब दूल्हे का बड़ा भाई (जेठ) होता है. बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और मैथिली इलाकों की शादियों में यह एक पारंपरिक गीत है. जब भसुर मंडप या आंगन में आते हैं तो दुल्हन की तरफ की महिलाएं हल्के-फुल्के अंदाज में गाती हैं “धीरे-धीरे हो भसूर, धीरे-धीरे…”. यह गाना मजाकिया, प्रेम से भरा और थोड़ा-सा शिकायती स्वभाव का होता है. इसमें भसुर से कहा जाता है कि वे जल्दी न करें, गहने दिखाएं, नखरे न दिखाएं और रीति-रिवाज को धीरे-धीरे निभाएं. यह शादी के माहौल को हल्का और खुशनुमा बनाता है. पुराने समय में अनुराधा पौडवाल और शारदा सिन्हा जैसे कलाकारों ने भी इसी थीम पर गाने गाए थे. यह नया वर्जन उसी परंपरा को नए अंदाज में पेश करती है.
बिहार-उत्तर प्रदेश की शादियों में मटकोर, हल्दी, जयमाला, सिंदूरदान जैसे रीति-रिवाजों के साथ ऐसे लोक गीत गाने की पुरानी परंपरा है. ये गीत सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि परिवार के रिश्तों (खासकर जेठ-बहू के) को हल्के-फुल्के तरीके से जाहिर करते हैं. “भसुर धीरे धीरे” उसी परंपरा का हिस्सा है जो आज भी शादियों में गाया जाता है. नई पीढ़ी इसे सोशल मीडिया और यूट्यूब के जरिए दोबारा खोज रही है. यह गाना पुरानी लोक परंपरा और आज के समय के अंदाज का सुंदर मेल है. अगर आप बिहारी/भोजपुरी शादी के माहौल को महसूस करना चाहते हैं या पारंपरिक विवाह गीत सुनना चाहते हैं, तो यह ट्रैक सुन सकते हैं. यह हल्का, मधुर और दिल को छू लेने वाला है.
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