कोक स्टूडियो भारत का गाना ‘कचौड़ी गली' रिलीज के बाद सोशल मीडिया पर खूब सुना गया। रेखा भारद्वाज और उत्पल उदित की आवाज में इस गीत ने भोजपुरी लोक रंग को नई पहचान दी. इसकी धुन में बनारस और पूर्वांचल की मिट्टी की खुशबू महसूस होती है. कई लोगों ने इसे इंस्टाग्राम रील्स में भी इस्तेमाल किया. पहली बार सुनने पर इसका नाम किसी खाने की चीज से जुड़ा लगता है. लेकिन इसके बोल एक महिला के इंतजार और बिछड़ने का दर्द बताते हैं. यही वजह है कि यह गीत सिर्फ सुनने में मधुर नहीं लगता, बल्कि अपनी कहानी की वजह से भी लोगों को रोककर सुनने पर मजबूर करता है.
कचौड़ी गली के नाम में छिपी है मोहब्बत
‘कचौड़ी गली' को पूर्वांचल की लोक परंपरा से जुड़ी कजरी माना जाता है. इसके बोलों में प्रेम और विरह दोनों दिखाई देते हैं। गीत में एक ऐसी प्रेमिका की आवाज सुनाई देती है, जिसका साथी उससे दूर हो गया है. लोककथा के मुताबिक इस गीत की कहानी करीब दो सौ साल पुरानी बताई जाती है. इसे गौहर जान से जोड़कर भी देखा जाता है. गौहर जान बनारस की दाल मंडी में रहती थीं. कहा जाता है कि एक दिन उनकी नजर कचौड़ी गली में असलम नाम के युवक पर पड़ी. दोनों के बीच कोई बातचीत नहीं हुई। फिर भी गौहर का मन उसकी ओर खिंच गया.
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पहली नजर का प्यार रह गया अधूरा
कहानी के मुताबिक गौहर को असलम से एकतरफा लगाव हो गया था. लेकिन यह रिश्ता आगे बढ़ पाता, उससे पहले ही दूरी आ गई. असलम के मिर्जापुर चले जाने की बात कही जाती है. उसके जाने के बाद गौहर के लिए इंतजार और अकेलापन ही बचा. गीत में इसी जुदाई की टीस सुनाई देती है. प्रेमी दूर है, प्रेमिका पीछे रह गई है, उसके पास सिर्फ यादें हैं, बाद में असलम के रंगून भेजे जाने की बात भी इस कहानी से जोड़ी गई. इसी वजह से लोकगीत में मिर्जापुर और रंगून जैसे स्थानों का जिक्र मिलता है.
महफिलों से होते हुए गीत पहुंचा नई पीढ़ी तक
यह गीत सिर्फ एक प्रेम कहानी तक सीमित नहीं रहा. समय के साथ यह विरह का लोकगीत बन गया. बनारस की महफिलों में इसे अलग-अलग कलाकारों ने गाया. जब किसी प्रेमिका के हिस्से में जुदाई आती थी, तो ऐसे गीत उसके दर्द की आवाज बनते थे. मशहूर गायिका रसूलन बाई ने भी इस पारंपरिक गीत को अपनी गायकी से पहचान दी. उनकी वजह से बनारस की संगीत परंपरा में ऐसे लोकगीतों को खास जगह मिली. यही लोकधुन आगे चलकर अलग-अलग कलाकारों तक पहुंचती रही.
बिस्मिल्लाह खान से मालिनी अवस्थी तक जारी रही परंपरा
बनारस की संगीत विरासत से जुड़े कई बड़े कलाकारों ने इस तरह की लोकधुनों को मंच दिया. मशहूर शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खान भी ‘कचौड़ी गली' को अपने कार्यक्रमों में बजाते थे. लोक गायिका मालिनी अवस्थी ने भी इस कजरी को कई बार अपनी आवाज दी. अब रेखा भारद्वाज और उत्पल उदित ने इसे नए अंदाज में पेश किया है. पुरानी लोकधुन को आधुनिक मंच मिला, नई पीढ़ी तक इसकी कहानी पहुंची. दिलचस्प बात यह है कि वाराणसी में कचौड़ी गली नाम की जगह आज भी मौजूद है.
यानी गाने का नाम सिर्फ कल्पना नहीं है. इसके पीछे बनारस की एक असली गली भी है. इसी वजह से ‘कचौड़ी गली' की धुन सुनते हुए ऐसा लगता है जैसे कोई पुरानी प्रेम कहानी आज भी बनारस की गलियों में सांस ले रही हो.
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