रानी मुखर्जी के करीब तीन दशक लंबे फिल्मी सफर में कई ऐसी फिल्में आई हैं, जिन्होंने सिर्फ बॉक्स ऑफिस पर कमाई नहीं की, बल्कि लोगों के दिलों-दिमाग पर अपनी छाप छोड़ी. कभी 'कुछ कुछ होता है' की टीना बनकर उन्होंने दर्शकों को अपना दीवाना बनाया, तो कभी 'ब्लैक', 'मर्दानी' और 'हिचकी' जैसी फिल्मों में बिल्कुल अलग तरह के किरदार निभाकर अपनी अभिनय क्षमता दिखाई.
अब रानी को सिने जगत में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए ऑस्ट्रेलिया की ला ट्रोब यूनिवर्सिटी ने उन्हें मानद डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया है. खास बात यह है कि शाहरुख खान के बाद रानी यह सम्मान पाने वाली दूसरी भारतीय फिल्मी हस्ती हैं.
ऑस्ट्रेलिया की ला ट्रोब यूनिवर्सिटी ने उन्हें ऑनरेरी डॉक्टर ऑफ लेटर्स की मानद उपाधि से सम्मानित किया है. यह सम्मान उन्हें इंडियन फिल्म फेस्टिवल ऑफ मेलबर्न (आईएफएफएम) 2026 के तहत फेडरेशन स्क्वायर में आयोजित एक खास समारोह में दिया गया. यूनिवर्सिटी ने यह सम्मान भारतीय सिनेमा में रानी के करीब तीन दशक लंबे योगदान को देखते हुए दिया है.
सम्मान मिलने के बाद रानी मुखर्जी ने इसे अपनी जिंदगी के सबसे खास पलों में से एक बताया. उन्होंने कहा, ''जब मैं छोटी थी, तब बाकी बच्चों की तरह मेरा भी सपना था कि मैं अपने परिवार और अपने देश को गर्व महसूस करा सकूं. हालांकि उस वक्त मुझे यह नहीं पता था कि मैं ऐसा कैसे करूंगी. मुझे बस इतना मालूम था कि अगर मैं किसी एक काम में पूरी मेहनत करके अच्छी बनूं, तो मेरे माता-पिता खुश होंगे. आखिरकार सिनेमा मेरे लिए वह माध्यम बना, जिसके जरिए मैं इस सपने को पूरा कर सकी.''
रानी ने अपने करियर के फैसलों के बारे में भी खुलकर बात की. उन्होंने कहा, ''मैं शुरुआत से ही जोखिम उठाने के लिए हमेशा तैयार रही. मैंने कभी आसान या सुरक्षित रास्ता नहीं चुना. मैं ऐसी फिल्मों को चुनती थी, जिनकी कहानी सबसे पहले मेरे दिल को छूती हो. मेरे लिए जरूरी रहा है कि कहानी ऐसी हो, जिसे बताया जाना चाहिए, जो लोगों को प्रेरित करे और उन्हें सशक्त बनाए. मेरे करियर में रोमांटिक फिल्मों के साथ-साथ सामाजिक मुद्दों पर बनी कई फिल्में भी शामिल हैं.''
अभिनेत्री ने कहा, ''मैं ऐसी कहानियों का हिस्सा बनना चाहती थीं, जिनमें महिलाओं को सिर्फ सहायक किरदार के रूप में नहीं, बल्कि अपनी सोच और फैसले रखने वाली मजबूत शख्सियत के तौर पर दिखाया जाए. अपने मन का काम करने के बदले ऐसा सम्मान मिलना आगे भी इसी दिशा में काम करने के लिए और प्रेरित करता है.''
रानी ने कहा, ''मैं हमेशा से यह मानती रही हूं कि फिल्में लोगों की सोच बदलने से पहले उनके दिल को बदल सकती हैं. हर कलाकार की जिम्मेदारी सिर्फ कैमरे के सामने प्रदर्शन करने तक खत्म नहीं होती. कलाकार धीरे-धीरे अपनी संस्कृति के प्रतिनिधि भी बन जाते हैं. अगर मेरी फिल्मों ने किसी एक व्यक्ति को भी भारत और यहां की महिलाओं को थोड़ा बेहतर समझने में मदद की है या लोगों के अंदर किसी मुद्दे को लेकर संवेदना पैदा की, तो मैं इसे एक अभिनेत्री के तौर पर अपनी जिम्मेदारी से कहीं बड़ी उपलब्धि मानती हूं.''
मानद डॉक्टरेट स्वीकार करते हुए रानी ने इस सम्मान को भारत और दुनियाभर के दर्शकों को समर्पित किया. उन्होंने कहा, ''मैं इसे सिर्फ रानी मुखर्जी के तौर पर नहीं, बल्कि एक भारतीय के रूप में गर्व से स्वीकार कर रही हूं. ऑस्ट्रेलिया में भारतीय संस्कृति और भारतीय सिनेमा को सम्मान मिलते देखना मेरे लिए बेहद गर्व की बात है. मैं इसे बहुत आभार, गहरी विनम्रता और गर्व के साथ अपने साथ रखूंगी.''
बता दें कि ला ट्रोब यूनिवर्सिटी इससे पहले साल 2019 में शाहरुख खान को भी सिनेमा में उनके योगदान के लिए सम्मानित कर चुकी है. यूनिवर्सिटी ने उनके नाम पर एक पीएचडी स्कॉलरशिप की घोषणा भी की थी.
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