कभी-कभी किसी पुराने गाने की धुन कानों में पड़ते ही दिल अचानक बीते दौर की गलियों में पहुंच जाता है. पर्दे पर सितारों की मासूम अदाएं, आंखों में छलकता प्यार और पीछे से आती ऐसी आवाज, जो सीधे दिल पर दस्तक दे. 1970 के दशक में कई ऐसे गाने आए, जिन्होंने प्यार को सिर्फ शब्दों में नहीं, बल्कि एहसास में बदल दिया. एक ऐसा ही गाना आज भी मोहब्बत की कशिश, जुदाई का डर और चाहत की बेचैनी अपने भीतर समेटे हुए है. धर्मेंद्र और मुमताज की शानदार केमिस्ट्री ने इस गाने को पर्दे पर और भी यादगार बना दिया. तो आखिर कौन-सा है यह सदाबहार गीत? इसका नाम है 'मैं तेरे इश्क में मर न जाऊं कहीं.'
धर्मेंद्र-मुमताज की जोड़ी ने लूटी महफिल
1973 में रिलीज हुई फिल्म लोफर में धर्मेंद्र और मुमताज की जोड़ी ने दर्शकों से काफी तारीफे बटोरी थीं. इसी फिल्म का यह रोमांटिक गाना आज भी पुराने हिंदी फिल्म संगीत के चाहने वालों के बीच खास जगह रखता है. गाने में प्रेमी के दिल की वह बेचैनी दिखाई देती है, जिसमें प्यार जितना गहरा होता जाता है, उतना ही खो देने का डर भी सताने लगता है. धर्मेंद्र के खास अंदाज और मुमताज की खूबसूरती ने गाने की भावनाओं को पर्दे पर बखूबी उतारा है. दोनों की केमिस्ट्री में एक तरफ शोखियां, तो दूसरी तरफ मोहब्बत की गहराई भी नजर आती है.
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लता की आवाज और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का जादू
इस गाने की सबसे बड़ी ताकत इसकी आवाज है. स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने अपनी सुरीली आवाज से गाने में ऐसी जान फूंकी कि इसके बोल सीधे लोगों के दिल तक पहुंचते हैं. गीतकार आनंद बक्शी के शब्द प्रेम की बेचैनी और समर्पण को बेहद खूबसूरती से सामने रखते हैं. वहीं लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की मधुर धुन ने गीत को ऐसा रंग दिया, जो दशकों बाद भी फीका नहीं पड़ा. इसलिए ही 'मैं तेरे इश्क में मर न जाऊं कहीं' आज भी पुराने फिल्मी गीतों की फेहरिस्त में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है.
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