दर्शकों को सावन से जुड़ा वो गाना जरूर याद होगा, “तुझे गीतों में ढाल लूँगा, सावन को आने दो….” फिल्म थी ‘सावन को आने दो'. जो लोग 60, 70 और 80 के दशक का सिनेमा देखते हुए बड़े हुए हैं, उन्हें ये गाना जरूर याद होगा और उन्होंने इसे देखा भी होगा. लेकिन इस बेहद लोकप्रिय गाने से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा भी है. तो आइए, सुनते हैं इसी गाने से जुड़ा वो किस्सा, जो इस फिल्म के म्यूजिक डायरेक्टर राजकमल जी के बेटे सूर्या राजकमल जी ने एनडीटीवी को बताया.
अरुण गोविल ने की रिहर्सल
आज इस गाने को देखिए तो अरुण गोविल के हाथ में नजर आने वाला एक अनोखा वाद्य यंत्र सबसे पहले ध्यान खींचता है. यह वायलिन नहीं, बल्कि राजस्थान का पारंपरिक वाद्य यंत्र ‘रावण हत्था' है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि अरुण गोविल ने इसे सिर्फ कैमरे के सामने दिखावे के लिए हाथ में नहीं पकड़ा था, बल्कि इसे बजाना सीखने के लिए बाकायदा रिहर्सल की थी?
सूर्या राजकमल बताते हैं कि फिल्म में राजस्थान की मिट्टी और वहां के संगीत को एक अलग पहचान देने की कोशिश की जा रही थी. ताराचंद बड़जात्या और राजकमल दोनों का राजस्थान से जुड़ाव था, इसलिए वह चाहते थे कि फिल्म के संगीत में वहां की लोक संस्कृति की झलक मिले. सूर्या राजकमल के मुताबिक, “ताराचंद जी ने पूछा कि इसमें क्या यूनिक चीज होगी? यूएसपी क्या होगी इसमें? तब डैडी ने कहा कि हमारा म्यूजिक राजस्थान का है. इसमें एक नई चीज, एक फ्रेश चीज है. पूरा संगीत राजस्थानी है.”
ताराचंद बड़जात्या की डिमांड
उस दौर में अक्सर हीरो के हाथ में कोई न कोई वाद्य यंत्र नजर आता था, जैसे राज कपूर के हाथ में डफली या किसी दूसरे हीरो के हाथ में गिटार. ऐसे में ताराचंद बड़जात्या भी चाहते थे कि अरुण गोविल के हाथ में कोई इंस्ट्रूमेंट हो, लेकिन वह ऐसा हो जो फिल्म की पृष्ठभूमि और राजस्थान की पहचान से जुड़ा हुआ हो.
तभी राजकमल ने राजस्थान के पारंपरिक वाद्य यंत्र ‘रावण हत्था' का सुझाव दिया. सूर्या राजकमल बताते हैं, “ताराचंद जी ने कहा कि हीरो के हाथ में कोई इंस्ट्रूमेंट होना चाहिए. तो डैडी ने कहा, ‘बाबूजी, अपना रावण हत्था उनके हाथ में होना चाहिए.'”
ताराचंद बड़जात्या के लिए ‘रावण हत्था' एक नया नाम था. उन्होंने इसके बारे में पूछा. इसके बाद राजकमल ने यह वाद्य यंत्र मंगवाया और अरुण गोविल को इसके बारे में समझाया गया. लेकिन अब सिर्फ इसे हाथ में पकड़ना काफी नहीं था. गाने में अरुण गोविल को इसे बजाते हुए भी दिखना था और इसके लिए उन्हें इसकी बारीकियां सीखनी थीं.
राजकमल से रावण हत्था सीखा
सूर्या राजकमल के मुताबिक, शूटिंग शुरू होने से करीब एक महीने पहले अरुण गोविल उनके घर आने लगे थे. अरुण गोविल सुबह-सुबह वहां पहुंचते और राजकमल से रावण हत्था बजाना सीखते. सूर्या राजकमल बताते हैं, “ताराचंद जी ने कहा था कि राजकमल जी से आप सीखिए कि ये कैसे बजता है. ये वायलिन नहीं है. अरुण जी हमारे यहां आते थे और पापा के साथ रिहर्सल करते थे कि ये बजाना कैसे है, ऊपर या नीचे कैसे चलाना है.”
यानी अरुण गोविल के लिए रावण हत्था सिर्फ कैमरे के सामने पकड़ने वाला कोई प्रॉप नहीं था. उन्होंने शूटिंग से पहले इसे बजाने की बाकायदा प्रैक्टिस की थी, ताकि गाने में उनके हाथों की हरकतें स्वाभाविक नजर आएं.
सबसे बड़ी यूएसपी
सूर्या राजकमल के मुताबिक, अरुण गोविल ने इस वाद्य यंत्र को जिस तरह सीखा, उसका असर स्क्रीन पर भी साफ दिखाई देता है. वह कहते हैं, “ये सबसे बड़ी एक यूएसपी है इस चीज की. आप जब भी अरुण जी के हाथ का पैटर्न देखेंगे, तो ऐसा लगता है कि वो खुद ही बजा रहे हैं.”
दिलचस्प बात यह है कि उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि ‘सावन को आने दो' में रावण हत्था बजाते नजर आ रहे अरुण गोविल कुछ साल बाद भारतीय टेलीविजन के सबसे लोकप्रिय किरदारों में से एक बन जाएंगे. ‘रामायण' में भगवान राम के रूप में उन्हें जो पहचान मिली, उसने उनकी छवि को हमेशा के लिए बदल दिया, लेकिन उससे पहले उनके करियर की इस फिल्म में उनका यह अंदाज भी दर्शकों ने देखा था.
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