1947 का वो दौर, जब मुल्क आजाद तो हुआ, लेकिन साथ ही लाखों जिंदगियां हमेशा के लिए बदल गईं. दंगों की आग में घर उजड़े, रिश्ते टूटे और सबसे ज्यादा दर्द महिलाओं ने झेला. एक लड़की, जिसकी जिंदगी शादी और परिवार के सपनों के साथ आगे बढ़ रही थी, अचानक अगवा कर ली जाती है. वह किसी तरह कैद से निकलकर अपने घर लौटती है, लेकिन अपनों का डर उसे फिर पराया कर देता है. इसके बाद शुरू होती है एक ऐसी कहानी, जिसमें प्यार, नफरत, मजहब और इंसानियत आमने-सामने खड़े नजर आते हैं. यह कहानी है अमृता प्रीतम के चर्चित उपन्यास पिंजर पर बनी फिल्म की.
जब अपनों ने ही अपनाने से कर दिया इनकार
फिल्म की कहानी 1947 के विभाजन के दौर में शुरू होती है. पुरो एक सामान्य जिंदगी जी रही है और जल्द ही उसकी शादी होने वाली है. लेकिन खानदानी दुश्मनी उसके जीवन को अचानक बदल देती है. रशीद पुरो का अपहरण कर लेता है और उसे अपने कब्जे में रखता है. पुरो किसी तरह वहां से भागकर अपने परिवार के पास पहुंचती है. उसे उम्मीद होती है कि उसके अपने उसे गले लगा लेंगे, लेकिन परिवार समाज और बदनामी के डर से उसे स्वीकार करने से इनकार कर देता है. यहीं से कहानी एक ऐसे मोड़ पर पहुंचती है, जहां पुरो के सामने अपनी जिंदगी को नए सिरे से देखने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता.यह चंद्र प्रकाश द्विवेदी द्वारा निर्देशित है। फिल्म भारत के विभाजन के दौरान हिंदुओं और मुसलमानों की समस्याओं के बारे में है। फिल्म अमृता प्रीतम द्वारा लिखित इसी नाम के एक पंजाबी उपन्यास पर आधारित है।
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बंटवारे की आग में बदल गई पुरो की दुनिया
इसी बीच देश का विभाजन हो जाता है. चारों तरफ हिंसा और दंगों का माहौल है. हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच बढ़ती नफरत के बीच पुरो खुद भी एक ऐसी ट्रेजेडी का हिस्सा बन जाती है, जिससे निकलना उसके लिए आसान नहीं है. कहानी में पुरो को रामचंद से लाजो के बारे में पता चलता है. इसके बाद वह लाजो को बचाने का फैसला करती है और उसे हिंदुस्तान भेजने में मदद करती है. लेकिन खुद पाकिस्तान में रशीद के साथ रहने का फैसला कर लेती है.

महिलाओं की पीड़ा को बेबाकी से दिखाती है फिल्म
फिल्म में विभाजन के दौरान महिलाओं पर हुए अत्याचार और उनकी बेबसी को बेहद संवेदनशील तरीके से दिखाया गया है. एक सीन में पुरो खेत से एक बच्चे को अपने साथ ले आती है और करीब छह महीने तक उसकी देखभाल करती है. लेकिन जब गांव के हिंदू समुदाय को इस बात की जानकारी मिलती है, तो वे बच्चे को उससे वापस ले लेते हैं. फिल्म में बलवाइयों की ओर से लड़कियों को अगवा किए जाने जैसे सीन के जरिए उस दौर की भयावह सच्चाई को भी सामने रखा गया है.
दमदार एक्टिंग ने कहानी को रियल दिखाया
2003 में आई फिल्म 'पिंजर' का निर्देशन चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने किया था. इस फिल्म में उर्मिला मातोंडकर, मनोज बाजपेयी और संजय सूरी, ईशा कोपिकर, कुलभूषण खरबंदा, फरीदा जलाल, संदली सिन्हा और प्रियांशु चटर्जी ने अभिनय किया. फिल्म में हर एक किरदार ने अपने रोल को बखूबी निभाया. फिल्म को देखकर ही उस समय के हालातों और महिलाओं के दर्द को महसूस किया जा सकता है. उर्मिला की एक्टिंग को दर्शकों ने खूब पसंद किया था. पिंजर 2003 में बॉक्स ऑफिस पर रिलीज हुई थी. जो अमृता प्रीतम के उपन्यास 'पिंजर' पर आधारित थी.
नेशनल अवॉर्ड ने बढ़ाया फिल्म का कद
फिल्म में पुरो के किरदार में उर्मिला मातोंडकर ने शानदार तरीके से निभाया है. वहीं रशीद के किरदार में मनोज बाजपेयी ने अपनी अदाकारी से कहानी में जान डाल दी. संजय सूरी और संधाली सिन्हा ने भी अहम भूमिकाओं में मजबूत एक्टिंग की. इस फिल्म के डायरेक्टर चंद्रप्रकाश द्विवेदी थे. फिल्म को क्रिटिक्स की खूब तारीफ मिली. इसे बेस्ट फीचर फिल्म कैटेगरी में नेशनल अवॉर्ड से सम्मानित किया गया. मनोज बाजपेयी को शानदार एक्टिंग के लिए स्पेशल ज्यूरी अवॉर्ड मिला. यह ‘सत्या' के बाद उनका दूसरा नेशनल अवॉर्ड था.
पिंजर फिल्म पर Prime Video पर देख सकते हैं.
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