दुनिया के कई ऐसे कलाकार हैं जो बॉलीवुड में काम करते हैं और दूसरे देशों से आकर भारत में बस गए. यहां उनका खुले दिल से स्वागत किया गया, यहां तक कि वे सुपरस्टार भी बन गए. लेकिन दूसरी तरफ इमरान खान जैसे लोग भी हैं, जो 'ओवरसीज सिटीजन ऑफ इंडिया' (OCI) हैं. उनका जन्म अमेरिका में हुआ था, लेकिन उन्होंने अपनी जिंदगी का ज्यादातर हिस्सा भारत में बिताया है. फिर भी हाल ही में मुंबई में हुए विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लेने की वजह से उन्हें देश छोड़ने का फरमान मिल गया. ईरान में जन्मीं, जर्मनी में पली-बढ़ीं और अब भारत में रहने और काम करने वालीं एल्नाज नोरौजी कहती हैं कि उन्हें कभी-कभी बहुत उलझन महसूस होती है, हालांकि वह खुद को एक "ईरानी-जर्मन-भारतीय" या सीधे शब्दों में कहें तो एक "ग्लोबल सिटिजन" (वैश्विक नागरिक) मानती हैं.
अपनी पहचान और जुड़ाव की चुनौतियों पर एल्नाज नोरौजी
'स्क्रीन' के साथ एक खास बातचीत में एल्नाज कहती हैं, "अपनी जिंदगी के ज्यादातर समय, मुझे ऐसा लगा है कि मैं कहीं की नहीं हूं. और ऐसा किसी भी इंसान के साथ हो सकता है जो उस देश में नहीं रहता, जहां वह पैदा हुआ था. यह स्वाभाविक है." ईरान में जन्म लेने और वहां आठ साल तक रहने के बाद, अपने देश में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण उनके परिवार को जर्मनी जाना पड़ा. वह याद करते हुए बताती हैं, "मुझे एक दूसरे देश जाना पड़ा, जहां मुझे यह साबित करना था कि मैं वहीं की हूं. कई मायनों में मैं खुद को जर्मन मानती हूं क्योंकि मेरी परवरिश पूरी तरह से जर्मन माहौल में हुई थी, लेकिन जैसे ही मैंने जर्मनी में खुद को साबित किया, मैं भारत आ गई और यहां मुझे फिर से खुद को साबित करना पड़ रहा है." “मैं चाहे कहीं भी चली जाऊं, हमेशा ईरान की ही रहूंगी. भले ही मैं अभी भारत में रहती हूं, लेकिन मैं कभी पूरी तरह से यहां की नहीं हो पाऊंगी, क्योंकि यह वह देश नहीं है जहां मेरा जन्म हुआ था. क्या मैं इसे अपना देश मानती हूं और अपना घर कहती हूं? बिल्कुल, पूरे दिल से और मैं जर्मनी को भी हमेशा अपना घर कहूंगी.” भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाना कोई आसान काम नहीं था, क्योंकि जिस माहौल से यह घिरी है, वह काफी हद तक पुरुषों की दुनिया है. एल्नाज बताती हैं, “इन लोगों से निपटने के लिए आपको कभी-कभी ‘पुरुषों वाली सोच' अपनानी पड़ती है, लेकिन साथ ही अपनी स्त्रीत्व को भी बनाए रखना होता है.”
एक्ट्रेस ने अपनी अलग पहचान बनाई है. चाहे भारत में उनकी एक्टिंग की शुरुआत हो, अनुराग कश्यप और विक्रमादित्य मोटवाने का 2018 का नेटफ्लिक्स इंडिया क्राइम थ्रिलर शो 'सेक्रेड गेम्स' हो, या फिर #MeToo मूवमेंट के दौरान फिल्म निर्माता विपुल शाह के खिलाफ आवाज़उठाना हो. उनके करियर में हमेशा पुरुषों की भीड़ के बीच उन्होंने अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है. वह कहती हैं, "आपको बस पुरुषों के साथ डील करना सीखना होगा. पुरुषों के काम करने का अपना तरीका होता है, ठीक वैसे ही जैसे महिलाओं का होता है. महिलाओं को यह सीखना चाहिए कि पुरुषों को कैसे संभालना है, और पुरुषों को भी यही सीखना चाहिए. इतने साल बीत गए, लेकिन हम अभी तक यह नहीं सीख पाए हैं कि एक साथ कैसे रहें और मिलकर काम कैसे करें."
हॉलीवुड फिल्म 'द फिक्स' में लीड एक्ट्रेस के तौर उन्होंने डेब्यू की है. यह फिल्म पिछले शुक्रवार, 26 अक्टूबर को भारत में रिलीज हुई. उन्होंने कहा, पुरुष अक्सर मुझे कम आंकते हैं. मैं लोगों को दोष नहीं देती, क्योंकि मुझे लगता है कि एक लंबी और सुंदर महिला के लिए दुनिया ऐसी ही है. लोगों को लगता है कि बस यही आपकी पहचान है, लेकिन जब मैं उन्हें दिखाती हूं कि मैं असल में क्या कर सकती हूं, तो उनके बर्ताव में बदलाव आता है. हालांकि, मुझे लगता है कि आपको बस इन सब चीजों से गुजरना ही पड़ता है. मैं दुनिया को तो नहीं बदल सकती, क्योंकि दुनिया ऐसी ही है. इसलिए, मुझे लगता है कि सबसे अच्छा तरीका यही है कि आप डटकर मुकाबला करें."
'द फिक्स' में एल्नाज नोरौजी
पुरुषों के इसी नजरिए (male gaze) ने उन्हें बॉलीवुड में एक अभिनेत्री के तौर पर अपनी पहचान बनाने से रोका. उन्हें अक्सर एक ही तरह के प्रोटोटाइप में सीमित कर दिया गया है. वह 'जुगजुग जियो' के गाने "दुपट्टा" और 'राष्ट्र कवच ओम' (2022) के गाने "काला शाह काला" जैसे 'आइटम' गानों में नजर आईं. फिर पिछले साल आई मिलाप जावेरी की 'मस्ती 4' जैसी सेक्स कॉमेडी फिल्मों में भी उन्हें इसी तरह का रोल मिला. हालांकि वह कहती हैं कि उन्हें स्टीरियोटाइपिंग से कोई दिक्कत नहीं है, बशर्ते उन्हें एक एक्टर के तौर पर अपनी काबिलियत साबित करने के पर्याप्त मौके मिलते रहें. वह कहती हैं, "आप 'सेक्रेड गेम्स' जैसे काम भी कर सकते हैं और गानों में भी परफॉर्म कर सकते हैं.
उन्होंने कहा, बॉलीवुड ने उन्हें तब उम्मीद दी जब उन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी. यानी ईरान से भागकर जर्मनी पहुंचने के ठीक बाद. "बॉलीवुड ने मुझे उस दर्द से बाहर निकाला, जिससे मैं और मेरा परिवार गुजर रहे थे. हमने अपना घर-परिवार पीछे छोड़ दिया था और एक ऐसे देश में चले गए थे, जो उस समय काफी नस्लवादी था और जिसने हमें खुले दिल से नहीं अपनाया था. हालांकि उन्होंने हमें शरण देकर एक तरह से हमारा स्वागत ही किया था, लेकिन वहां के लोग हमारे बारे में पूरी तरह आश्वस्त नहीं थे, क्योंकि हम किसी दूसरे देश से भागकर आए थे. इसलिए, मैं जर्मन लोगों के नजरिए को भी समझ सकती हूं." वह आगे कहती हैं, "लेकिन बॉलीवुड ने मुझे एक सपनों की दुनिया में पहुंचा दिया. मुझे वह दुनिया बहुत पसंद थी. सुबह से रात तक, मैं बस बॉलीवुड के गाने सुनती रहती थी.
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