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कान्स 2026 में दिखा मनीष मल्होत्रा का जलवा, उर्मिमाला बरुआ और स्निग्धा बरुआ ने पहनी उनकी कस्टम पोशाक

स्निग्धा बरुआ हल्के गुलाबी रेशमी परिधान में नजर आईं, जिसमें असमिया घूंघट की परंपरा को नए अर्थ के साथ प्रस्तुत किया गया था.

कान्स 2026 में दिखा मनीष मल्होत्रा का जलवा, उर्मिमाला बरुआ और स्निग्धा बरुआ ने पहनी उनकी कस्टम पोशाक
कान्स 2026 में दिखा मनीष मल्होत्रा का जलवा, उर्मिमाला बरुआ और स्निग्धा बरुआ ने पहनी उनकी कस्टम पोशाक

दिब्रूगढ़, असम से निकलीं मां-बेटी की जोड़ी उर्मिमाला बरुआ और स्निग्धा बरुआ ने 2026 के कान्स फिल्म फेस्टिवल के रेड कार्पेट पर एक बार फिर अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई. मनीष मल्होत्रा की कस्टम डिजाइन की हुई पोशाकों में सजी इस जोड़ी ने फैशन से आगे बढ़कर पहचान, विरासत और प्रतिनिधित्व का संदेश दिया. UMB पेजेंट्स पहल की संस्थापक उर्मिमाला और स्निग्धा बरुआ लंबे समय से असम और पूर्वोत्तर भारत की महिलाओं को सशक्त बनाने का काम कर रही हैं. 2025 में कान्स में ऐतिहासिक उपस्थिति दर्ज कराने के बाद, इस बार वे और भी अधिक आत्मविश्वास, गरिमा और सांस्कृतिक गर्व के साथ लौटीं. उनके परिधान ने भारतीय शिल्पकला और असमिया परंपरा का सुंदर संगम पेश किया.

स्निग्धा बरुआ हल्के गुलाबी रेशमी परिधान में नजर आईं, जिसमें असमिया घूंघट की परंपरा को नए अर्थ के साथ प्रस्तुत किया गया था. इस लुक में हाथ से पिरोए गए मोतियों का इस्तेमाल किया गया था. इसके साथ उन्होंने माणिक और हीरों से सजे एक आकर्षक हार को पहना, जिसे तैयार करने में कई महीनों की मेहनत लगी.

उर्मिमाला बरुआ ने गहरे बैंगनी रंग की पोशाक चुनी, जिसमें क्रिस्टल डिटेलिंग थी और जिसने उनके घूंघट जैसे ड्रेप को एक सशक्त, स्थापत्य रूप दिया. उन्होंने ब्राज़ीलियन अमेथिस्ट से बने हार पहने, जिससे उनका लुक और भी राजसी और प्रभावशाली बन गया. मां और बेटी, दोनों ने मिलकर असमिया परंपरा को समकालीन फैशन भाषा में प्रस्तुत किया.

कान्स में उनकी उपस्थिति केवल स्टाइल का प्रदर्शन नहीं थी, बल्कि यह पूर्वोत्तर भारत की संस्कृति और पहचान को मुख्यधारा में लाने का प्रयास भी था. उन्होंने दिखाया कि क्षेत्रीय परंपराएं वैश्विक मंच पर भी पूरे आत्मसम्मान के साथ प्रस्तुत की जा सकती हैं. रेड कार्पेट पर उनका यह रूप सांस्कृतिक गौरव और आत्मविश्वास का प्रतीक बन गया.

असम के लोगों और पूर्वोत्तर समुदाय के लिए उर्मिमाला बरुआ और स्निग्धा बरुआ की यह उपस्थिति गर्व का क्षण रही. उनकी यह यात्रा बताती है कि अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए भी वैश्विक मंच पर प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराई जा सकती है. उनकी यह पेशकश सिर्फ फैशन नहीं, बल्कि पहचान की एक मजबूत अभिव्यक्ति थी.

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