लता मंगेशकर के परिचय में कुछ भी कहना सूरज को दीये जैसा होगा. भारतीय सिनेमा की लीजेंड्री सिंगर जिन्हें स्वर कोकिला कहा जाता रहा. भारतीय सिनेमा में उनका योदगान बेमिसाल रहा. करीब 8 दशक के अपने फिल्मी करियर में उन्होंने 36 से ज्यादा भाषाओं में गाने गाए. इनमें कुछ विदेशी भाषाएं भी शामिल हैं. अपने डिसिप्लेन के लिए जानी जानें वालीं लता मंगेशकर की एक खास आदत थी वह रिकॉर्डिंग के लिए जब भी स्टूडियो में घुसतीं तो चप्पल बाहर ही छोड़ा करती थीं. ऐसा इसलिए क्योंकि उन्होंने स्टूडियो को हमेशा एक मंदिर का दर्जा दिया. अपने परफेक्शन के बावजूद लता मंगेशकर रिलीज के बाद कभी अपना गाना नहीं सुनती थीं. लता ने खुद एक बार एक इंटरव्यू में कहा था था कि वह अपने गाने इसलिए नहीं सुनतीं क्योंकि अगर उन्होंने ऐसा किया तो वे खुद ही गलतियां निकालती रहेंगे.
लता मंगेशकर ने अपने पूरे करियर में कई सम्मान हासिल किए. 1989 में भारत सरकार ने उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार दिया. 2001 में राष्ट्र के लिए उनके योगदान को मान्यता देते हुए, उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया. इसके साथ लता भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान पाने वाली दूसरी गायिका बनीं. 2009 में फ्रांस ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार, नेशनल ऑर्डर ऑफ द लीजन ऑफ ऑनर का अधिकारी बनाया.

लता मंगेशकर का पहला गाना
लता मंगेशकर ने 1942 में अपने पिता को खो दिया. उस वक्त वे महज 13 साल की थीं. उनके पिता की दिल की बीमारी के चलते मृत्यु हो गई. ऐसे में नवयुग चित्रपट मूवी कंपनी के मालिक और मंगेशकर परिवार के करीबी दोस्त मास्टर विनायक (विनायक दामोदर कर्नाटकी) ने उनकी देखभाल की. उन्होंने लता की एक गायक और एक्ट्रेस के तौर पर करियर शुरू करने में मदद की.
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विनायक की मदद से लता ने 13 साल की उम्र में मराठी फिल्म किती हसाल में "नाचू या गाडे, खेलु सारी मानी हौस भारी" गीत गाया. इसे सदाशिवराव नेवरेकर ने कम्पोज किया था, लेकिन गीत को फिल्म के फाइनल कट से हटा दिया गया था. विनायक ने उन्हें नवयुग चित्रपट की मराठी फिल्म पहिली मंगला-गौर (1942) में एक छोटी सा किरदार दिया जिसमें उन्होंने "नताली चैत्राची नवलाई" गाया. लता मंगेशकर का पहला हिंदी फिल्म गजभाऊ (1943) के लिए "माता एक सपूत की दुनिया बदल दे तू" था. बॉलीवुड इंडस्ट्री में अभी अपने पैर जमाना बाकी था. इसलिए लता मंगेशकर को पहले एक्टिंग पर ध्यान देना पड़ा जो उन्हें पसंद नहीं था.
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