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वहीदा रहमान का वो गाना जिसे देख समझ जाएंगे कैसा था गांव-देहात में डोली में बैठी दुल्हन को देखने का शौक, 60 साल पहले आशा-शैलेंद्र ने बनाया एवरग्रीन

वहीदा रहमान का 60 साल पुराना वो गाना जिसे देख समझ जाएंगे गांव-देहात में दुल्हन का चेहरा देखने का बच्चों में कैसा होता था क्रेज. शैलेंद्र के बोले और आशा भोसले की आवाज में आज भी अमर.

वहीदा रहमान का वो गाना जिसे देख समझ जाएंगे कैसा था गांव-देहात में डोली में बैठी दुल्हन को देखने का शौक, 60 साल पहले आशा-शैलेंद्र ने बनाया एवरग्रीन
60 साल पुराना गाना, वहीदा रहमान को दुल्हन और बैलगाड़ी को डोली समझ पीछे भागने लगे बच्चे
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नई दिल्ली:

60 साल पहले आई हिंदी फिल्म तीसरी कसम का एक छोटा सा सीन आज भी भारतीय गांव की याद दिलाता है. बैलगाड़ी में बैठी वहीदा रहमान और उनके पीछे दौड़ते बच्चे, जो उन्हें दुल्हन समझकर गा रहे हैं, 'लाली लाली डोलिया में लाली रे दुल्हनिया (Lali Lali Doliya Mein Lali Re Dulhaniya).' यह गीत आशा भोसले की आवाज, शैलेन्द्र के बोल और शंकर-जयकिशन के संगीत से बना ऐसा लोक-चित्र है, जिसे देखकर समझ आता है कि उन दिनों गांव में डोली में बैठी दुल्हन को देखने का कितना शौक हुआ करता था. इसी शौक को लेकर शैलेंद्र ने ऐसा गाना रच डाला जो छह दशक बाद भी ताजगी से भरपूर है.

फिल्म 1966 में रिलीज हुई. निर्देशन बासु भट्टाचार्य का था और निर्माण खुद गीतकार शैलेन्द्र ने किया था. फिल्म हिंदी साहित्य के प्रमुख लेखक फणीश्वरनाथ रेणु की प्रसिद्ध कहानी मारे गए गुलफाम पर आधारित है. राज कपूर हीरामन बने हैं और वहीदा रहमान नौटंकी की कलाकार हीराबाई. फिल्म बिहार के ग्रामीण जीवन, सादगी और अधूरे प्रेम की कहानी है. फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कामयाबी का मुंह नहीं देख सकी. लेकिन इसे राष्ट्रीय पुरस्कार मिला और हिंदी सिनेमा की श्रेष्ठ फिल्मों में गिना जाने लगा. शैलेन्द्र के लिए बतौर प्रोड्यूसर यह पहली और आखिरी फिल्म थी.

लाली लाली डोलिया में लाली रे दुल्हनिया

ये गाना उस दौर का है जब डोलियों में जाती दुल्हन को देखने का बच्चों में जबरदस्त क्रेज होता था. इसी तर्ज पर रास्ते में गांव के बच्चे बैलगाड़ी को डोली समझ लेते हैं और हीराबाई को नवविवाहिता दुल्हन. वे पीछे-पीछे दौड़ते हुए गाते हैं. बोल सीधे-सादे हैं जो शैलेन्द्र ने रेणु की कहानी से ही पंक्तियां लीं और उन्हें लोकगीत जैसा रूप दे दिया:

लाली लाली डोलिया में लाली रे दुल्हनिया
पिया की पियारी भोली भाली रे दुल्हनिया,
लाली लाली डोलिया में लाली रे दुल्हनिया
मीठे बैन तीखे नैनों वाली रे दुल्हनिया,
लौटेगी जो गोदी भर हमें ना भुलाना
लड्डू पेढ़े लाना अपने हाथों से खिलाना
तेरी सब रातें हों दीवाली रे दुल्हनिया, 
दूल्हे राजा रखना जतन से दुल्हन को
कभी न दुखाना तू गोरिया के मन को
नाज़ुक है नाज़ों की है पाली रे दुल्हनिया

तीसरी कसम फिल्म की ज्यादातर शूटिंग बिहार और मध्य प्रदेश में हुई. फिल्म के गीतों में पान खाये सैंया हमारो, सजन रे झूठ मत बोलो और चलत मुसाफिर भी लोकप्रिय हुए. ये फिल्म अपनी सादगी और कहानी की वजह से बेजोड़ है.

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