हिंदी सिनेमा में कई ऐसे गायक हुए हैं, जिनकी आवाज का जादू दशकों बाद भी लोगों के सिर चढ़कर बोलता है. किशोर कुमार (Kishore Kumar) भी ऐसे ही सदाबहार कलाकारों में शुमार हैं. अपनी अनोखी गायकी, शानदार अदाकारी और बेमिसाल अंदाज से उन्होंने लाखों दिलों में जगह बनाई. 13 अक्टूबर 1987 को 58 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कहने वाले किशोर दा आज भी अपने गानों के जरिए लोगों के बीच जिंदा हैं. उनके गीत आज भी महफिलों से लेकर संगीत प्रेमियों की प्लेलिस्ट तक में शामिल हैं.
किशोर कुमार की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक दौर में उनकी गायकी की तुलना दिग्गज सिंगर मोहम्मद रफी (Mohammed Rafi) से होने लगी थी. दोनों के प्रशंसक अपने-अपने पसंदीदा गायक को बेहतर साबित करने में जुटे रहते थे. यह बहस इतनी बढ़ गई कि एक फिल्मी मैगजीन तक पहुंच गई. लेकिन इस विवाद को खत्म करने के लिए खुद किशोर कुमार ने ऐसा कदम उठाया, जिसने उनके व्यक्तित्व का एक अलग ही पहलू सामने ला दिया.
किशोर कुमार और मोहम्मद रफी में कौन था बेहतर?
हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में किशोर कुमार और मोहम्मद रफी दोनों का अपना अलग मुकाम रहा है. रफी साहब की सुरीली आवाज और गायकी की विविधता ने उन्हें खास पहचान दिलाई, वहीं किशोर कुमार अपने अनोखे अंदाज और हर तरह के गानों को अपनी आवाज में ढालने की कला के लिए मशहूर रहे. दोनों की लोकप्रियता इतनी ज्यादा थी कि संगीत प्रेमियों के बीच अक्सर इस बात पर चर्चा होती थी कि आखिर दोनों में सबसे बेहतरीन गायक कौन है.
इसी दिलचस्प किस्से का जिक्र मशहूर गीतकार और पटकथा लेखक जावेद अख्तर ने अपने कार्यक्रम ‘जाने पहचाने विद जावेद अख्तर' में किया था. उन्होंने बताया कि एक समय ऐसा आया, जब किशोर कुमार और मोहम्मद रफी की गायकी को लेकर चल रही बहस ने काफी जोर पकड़ लिया था.
एक लोकप्रिय फिल्म मैगजीन ने इस चर्चा को आगे बढ़ाते हुए पाठकों से खत मंगवाने शुरू कर दिए. रफी साहब के प्रशंसक अपने पसंदीदा गायक के समर्थन में लिखते थे, जबकि किशोर कुमार के चाहने वाले अपने चहेते कलाकार को महान बताते हुए पत्र भेजते थे. धीरे-धीरे यह सिलसिला बढ़ता गया और मैगजीन में दोनों गायकों के प्रशंसकों की राय छपने लगी.
जब किशोर कुमार ने खत लिखकर खत्म करवा दी बहस
इस बहस के बीच मैगजीन को एक ऐसा पत्र मिला, जिसने पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया. यह खत किसी प्रशंसक का नहीं, बल्कि खुद किशोर कुमार का था. जावेद अख्तर के मुताबिक, किशोर दा ने अपने पत्र में साफ किया कि उन्हें मोहम्मद रफी के साथ इस तरह की तुलना पसंद नहीं है.
किशोर कुमार ने रफी साहब के प्रति अपना सम्मान जाहिर करते हुए कहा कि इस तरह की बहस से उन्हें तकलीफ होती है. वह मोहम्मद रफी को बेहद सम्मान की नजर से देखते थे और उन्हें अपने साथ इस तरह मुकाबले में खड़ा करना सही नहीं मानते थे. उन्होंने यह भी बताया कि रफी साहब के गाए गीतों को गाने के लिए भी वह उनसे अनुमति लेते थे.
किशोर कुमार के इस पत्र का संदेश साफ था. उनके लिए संगीत किसी प्रतियोगिता का नाम नहीं था, जिसमें एक कलाकार को दूसरे से बड़ा साबित किया जाए. वह मोहम्मद रफी की प्रतिभा और उनके योगदान को दिल से स्वीकार करते थे. उनके इस रुख ने दोनों गायकों के प्रशंसकों के बीच चल रही बहस को शांत करने में अहम भूमिका निभाई.
सिर्फ महान गायक नहीं, बड़े दिल वाले इंसान भी थे किशोर दा
किशोर कुमार की जिंदगी और करियर से जुड़े इस किस्से से पता चलता है कि वह सिर्फ अपनी गायकी के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी सोच के लिए भी खास थे. उस दौर में जब उनके प्रशंसक उन्हें सबसे बड़ा गायक साबित करने में जुटे थे, तब उन्होंने खुद आगे आकर दूसरे कलाकार के प्रति सम्मान जताया.
मोहम्मद रफी और किशोर कुमार की गायकी की शैली भले ही अलग रही हो, लेकिन दोनों ने हिंदी सिनेमा के संगीत को यादगार गीत दिए. दोनों की आवाज में कई ऐसे गाने रिकॉर्ड हुए, जिन्हें आज भी संगीत प्रेमी बड़े चाव से सुनते हैं. उनकी गायकी ने अलग-अलग दौर के दर्शकों को प्रभावित किया और हिंदी फिल्म संगीत को समृद्ध बनाया.
किशोर कुमार आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके गानों की लोकप्रियता कम नहीं हुई है. वहीं, मोहम्मद रफी की आवाज का जादू भी आज तक बरकरार है. दोनों दिग्गजों से जुड़ा यह किस्सा याद दिलाता है कि महानता सिर्फ अपनी प्रतिभा से नहीं, बल्कि दूसरे की प्रतिभा को सम्मान देने से भी साबित होती है.
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