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गलगोटिया विवाद पर बोले विवेक अग्निहोत्री- यह एक ऐसे सिस्टम की तस्वीर है जो ओरिजिनल रिसर्च से ज्यादा दिखावे को महत्व देता है

फिल्ममेकर और लेखक विवेक रंजन अग्निहोत्री ने गलगोटिया यूनिवर्सिटी के रोबोटिक कुत्ते विवाद का विश्लेषण करते हुए सोशल मीडिया पर एक पोस्ट किया है. उन्होंने इसे महज एक घटना नहीं, बल्कि भारतीय शिक्षा और इनोवेशन सिस्टम की कमजोरी का प्रतीक बताया है.

गलगोटिया विवाद पर बोले विवेक अग्निहोत्री- यह एक ऐसे सिस्टम की तस्वीर है जो ओरिजिनल रिसर्च से ज्यादा दिखावे को महत्व देता है
विवेक रंजन अग्निहोत्री ने गलगोटिया यूनिवर्सिटी विवाद का विश्लेषण करते हुए पोस्ट किया है
नई दिल्ली:

फिल्ममेकर और लेखक विवेक रंजन अग्निहोत्री ने गलगोटिया यूनिवर्सिटी के रोबोटिक कुत्ते विवाद का विश्लेषण करते हुए सोशल मीडिया पर एक पोस्ट किया है. उन्होंने इसे महज एक घटना नहीं, बल्कि भारतीय शिक्षा और इनोवेशन सिस्टम की कमजोरी का प्रतीक बताया है. विवाद की शुरुआत हाल ही में दिल्ली में हुए इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट से हुई. गलगोटिया यूनिवर्सिटी के पवेलियन में एक चार पैरों वाला रोबोटिक कुत्ता खड़ा दिखाया गया. इसे 'सेंटर ऑफ एक्सीलेंस' और 'एआई लीडरशिप' के तौर पर प्रचारित किया गया, लेकिन जांच में पता चला कि यह रोबोट चीनी कंपनी यूनिट्री रोबोटिक्स का कमर्शियल प्रोडक्ट था, न कि यूनिवर्सिटी द्वारा विकसित. विवाद बढ़ने पर स्टॉल खाली करवाया गया और माफी मांगी गई.

विवेक अग्निहोत्री ने लिखा कि यह घटना रोबोट के बारे में नहीं, बल्कि हमारी मानसिकता के बारे में है. उन्होंने कहा कि टेक्नोलॉजी इम्पोर्ट करना गलत नहीं है. दुनियाभर के देश ऐसा करते हैं, लेकिन इसे अपनी इन्वेंशन दिखाना एंग्जायटी और एडवांस्ड दिखने की जल्दबाजी को दिखाता है. यह एक ऐसे सिस्टम की तस्वीर है जो ओरिजिनल रिसर्च से ज्यादा दिखावा को महत्व देता है.

उन्होंने भारतीय शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए. प्राइवेट यूनिवर्सिटी अक्सर पॉलिटिकल और बिजनेस हितों से जुड़ी होती हैं. यहां एजुकेशन रेवेन्यू का जरिया बन जाती है, कैंपस इवेंट वेन्यू बन जाते हैं और रिसर्च ब्रांडिंग के मुकाबले पीछे रह जाती है. एआई जैसी क्रांतिकारी टेक्नोलॉजी को फेस्टिवल थीम या ब्रोशर की सजावट की तरह लिया जा रहा है, जबकि यह सभ्यता बदलने वाली ताकत है.

विवेक रंजन ने प्राचीन भारत का जिक्र करते हुए बताया कि नालंदा, तक्षशिला और विक्रमशिला जैसी यूनिवर्सिटी दुनियाभर से छात्रों को आकर्षित करती थीं. वहां डिबेट, स्कॉलरशिप और सवाल पूछने को बढ़ावा मिलता था. आज हम क्रेडिबिलिटी, इंटेलेक्चुअल ईमानदारी और इमैजिनेशन को जला रहे हैं. संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन फाउंडेशनल मॉडल डेवलपमेंट में बहुत आगे हैं. उनकी प्राइवेट लैब और यूनिवर्सिटी बड़े कंप्यूट बजट और रिसर्च ऑटोनॉमी के साथ काम करती हैं.

उन्होंने पूछा, आज का “खिलजी” कौन है? विदेशी हमलावर या वह सिस्टम जो पूछताछ की जगह तमाशा पसंद करता है? एआई के दौर में भारत अगर सिर्फ परफॉर्मेंस देता रहा तो हम दूसरों की इंटेलिजेंस के कंज्यूमर बन जाएंगे. अमेरिका और चीन फाउंडेशनल मॉडल बना रहे हैं, जबकि भारत अभी फ्रेमवर्क पर बहस कर रहा है. विवेक ने सुझाव दिया कि भारत में यूनिवर्सिटी को पॉलिटिक्स से अलग रखने और एकेडमिक ऑटोनॉमी कानूनी रूप से सुरक्षित करने को लेकर तुरंत कदम उठाने चाहिए. एआई को इंटीग्रेशन के स्तर पर लाना और गवर्नेंस, हेल्थ, एग्रीकल्चर, एजुकेशन में इसका इस्तेमाल करना जरूरी है. विवेक ने कहा कि पहली बस भले चूक गई हो, लेकिन अगला पड़ाव अभी बाकी है. लेकिन इसके लिए थिएटर नहीं, असली एक्शन चाहिए.

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