बॉलीवुड के कुछ गाने केवल भारत में नहीं बने बल्कि उनकी नीव पाकिस्तान से भी जुड़ी हुई है. पाकिस्तान के कई शायरों और कवियों ने हिंदी फिल्मों के लिए गाने लिखा और अमर बनाया. ऐसा ही एक पाकिस्तानी शेर है, जिसको बॉलीवुड की कई फिल्मों में अलग-अलग अंदाज में शामिल किया गया है. इस शेर का नाम 'मोहे आई ना जग से लाज' है. इस शेर को पाकिस्तान के लेकर भारतीय फिल्मों में गानों के तौर पर कई तरह से लिया गया है.
माला बेगम और पंकज उदास ने अमर बनाया
'मोहे आई ना जग से लाज, मैं इतना जोर से नाची आज… के घुंघरू टूट गए'. कतील शिफाई का यह शेर सिर्फ कविता नहीं, बल्कि एक जीवंत भावना है जो पाकिस्तान से भारत तक, गजल से मुजरा और पार्टी एंथम तक फैल गई. 1969 में माला बेगम की आवाज से शुरू होकर पंकज उदास ने इस शेर को अमर बना दिया, फिर आशा भोसले की फिल्मी प्रस्तुति और बाद के कई रीमेक्स ने इसे हर पीढ़ी तक पहुंचाया. यह कहानी उसी धुन की है जो टूटकर भी बजती रही.
पहली बार पाकिस्तान फिल्म सुनाया शेर
कतील शिफाई के इस शेर को पहली बार 1969 की पाकिस्तानी फिल्म 'नाज' में सुना गया. इसे माला बेगम ने गाया था, संगीत निसार बाजमी का था. बाद में नूर जहां, रूना लैला, गुलशन आर्या सैयद, साबरी ब्रदर्स और आबिद परवीन जैसी आवाजों ने इसे अपनाया. भारत में पंकज उदास ने 1981 के नॉन-फिल्म एल्बम में 'मोहे आई ना जग से लाज' गाया और अपनी मखमली आवाज से पूरे भारत का दिल जीत लिया. उनके लाइव शो और एल्बमों ने इसे गजल प्रेमियों का फेवरेट बना दिया.
बॉलीवुड कई फिल्मों का बना हिस्सा
1988 में रिलीज हुई 'एक ही मकसद' में यह गाना 'मोहे आई ना जग से लाज' के रूप में शामिल हुआ. संगीत पंकज उदास, गायिका आशा भोसले. निर्देशक प्रवीण भट्ट, जबकि फिल्म के मुख्य कलाकार ओम पुरी, दिव्या राणा, राज किरण और डैनी डेंजोंगपा थे. फिल्म 1982 की 'धर्मकांटा' में नौशाद-मजरूह सुल्तानपुरी का अलग ट्यून वाला वर्जन आशा भोसले ने सुनाया. 1987 की 'परम धर्म' में बाप्पी लाहिड़ी-सलमा आगा वर्जन आया. 2016 की 'कैबरे' में नीति मोहन ने इसे नया रूप दिया. 2019 की 'वॉर' में विशाल-शेखर का 'घुंघरू' इसी मुखड़े से प्रेरित था.
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