छठ पूजा चार दिनों तक चलने वाला लोक आस्था का महापर्व है. यह पर्व खास तौर पर यूपी-बिहार में मनाया जाता है. मुख्य रूप से सूर्य देव और छठी मैया को समर्पित है. इसकी शुरुआत नहाय-खाय से होती है, जिसके बाद खरना, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य के साथ इसका समापन होता है. छठ पूजा का मुख्य आकर्षण इसके गाने हैं. जो इस पर्व को और भी खास बनाते हैं. छठ पर्व का गाना उग हो सुरुज देव... इस पर्व पर खास तौर पर गाया और सुना जाता है. लोग मानते हैं कि यह गाना शारदा सिन्हा ने गाया था. हालांकि यह सच नहीं है. यह गाना शारदा सिन्हा से पहले किसी और सिंगर ने गाया था.
जी हां वह सिंगर हैं बिंध्यवासिनी देवी, जो एक मशहूर लोक गायिका और ऑल इंडिया रेडियो पटना की पहली आवाज थीं. उन्होंने शारदा सिन्हा से बहुत पहले ही छठ पूजा के लोक गीतों की शुरुआती मेनस्ट्रीम और स्टूडियो रिकॉर्डिंग की थी. HMV और रेडियो पर रिकॉर्ड किए गए उनके ऐतिहासिक गानों ने ही छठ संगीत की नींव रखी. बहुत से लोग मानते हैं कि छठ के सबसे पहले रिकॉर्ड किए गए गाने आधुनिक या बाद के मशहूर कलाकारों ने गाए थे, लेकिन असल में पारंपरिक छठ गीतों की कमर्शियल और रेडियो रिकॉर्डिंग की शुरुआत बिंध्यवासिनी देवी ने ही की थी. उन्हें बिहार कोकिला के नाम से भी जाना जाता था.
छठ के मशहूर शुरुआती गाने
"उग हो सुरुज देव भइल भिनुसरवा", "सोने के खराउआ हो दीनानाथ", "केरवा जे फरेला घवध से". इन गानों को सिंगर ने अपनी आवाज दी थी. बिंध्यवासिनी देवी को 'बिहार कोकिला' के नाम से जाना जाता था. वह पटना स्थित 'विंध्य कला मंदिर' की संस्थापक थीं, जो लोक संगीत को बढ़ावा देने वाली एक संगीत अकादमी है. यह अकादमी पिछले 55 वर्षों से लखनऊ के भातखंडे विश्वविद्यालय से जुड़ी हुई है और अब इसे उनकी बहू शोभा सिन्हा और बेटे सुधीर कुमार सिन्हा द्वारा चलाया जाता है. उनका जन्म बिहार राज्य के मुजफ्फरपुर में हुआ था और उन्हें मैथिली, भोजपुरी और मगही लोक संगीत में महारत हासिल थी. उन्होंने 'विवाह गीत' फिल्म में 'छोटे दूल्हा के' जैसा लोकप्रिय गाना भी गाया था और उनके कई गाने सीडी (CD) फॉर्मेट में जारी किए गए हैं.
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भारत सरकार ने उन्हें 1974 में चौथे सबसे बड़े नागरिक सम्मान 'पद्म श्री' से सम्मानित किया. संगीत नाटक अकादमी ने उन्हें 1991 में अपना वार्षिक पुरस्कार और 2006 में अकादमी फेलोशिप प्रदान की. उन्हें 1998 में मध्य प्रदेश सरकार से 'अहिल्या बाई पुरस्कार' मिला. बिंध्यवासिनी देवी का निधन 18 अप्रैल 2006 को 86 वर्ष की आयु में उनके कंकड़बाग स्थित आवास पर हुआ. उनकी शादी शेदेश्वर चंद्र वर्मा से हुई थी और उनके दो बेटे और एक बेटी थी.
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