सावन का महीना चल रहा है और इस मौसम में रेडियो पर पुराने हिंदी फिल्मी गीतों की गूंज सुनाई देने लगती है. हिंदी सिनेमा में सावन का गीतों से गहरा रिश्ता रहा है. कई फिल्मों के नाम भी सावन से जुड़े रहे हैं, फिर चाहे वह ‘आया सावन झूम के' हो, ‘सावन भादों' हो या फिर ‘सावन को आने दो'. इन फिल्मों के गीत आज भी सावन की यादों को ताजा कर देते हैं.‘सावन को आने दो' की बात करें तो फिल्म में अरुण गोविल, जरीना वहाब और रीता भादुड़ी ने अभिनय किया था.
फिल्म का दिलचस्प किस्सा
फिल्म का निर्देशन ताराचंद बड़जात्या ने किया था. यह फिल्म ‘रामायण' से काफी पहले आई थी. उस वक्त अरुण गोविल भगवान राम के किरदार से घर-घर में मशहूर नहीं हुए थे. ‘सावन को आने दो' उनकी कामयाब फिल्मों में शामिल रही और इसके गीतों ने भी खूब लोकप्रियता हासिल की. इस फिल्म से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा इसके संगीतकार राजकमल के बेटे सूर्या राजकमल ने एनडीटीवी के साथ खास बातचीत में सुनाया. सूर्या राजकमल खुद संगीतकार हैं और कई धारावाहिकों में संगीत दे चुके हैं.
गानों को सुनाने का तरीका
उन्होंने बताया कि उनके पिता का गाने सुनाने का एक खास तरीका था. वह किसी फिल्म की सिटिंग में जाने से पहले गानों का एक फोल्डर और उनका क्रम तैयार करके रखते थे. सूर्या राजकमल के मुताबिक, “फादर का एक सिस्टम था कि वो जब भी कोई भी सॉन्ग या कोई सिटिंग में जाते थे, तो वो अपना एक फोल्डर बनाकर जाते थे. उसमें ये तय होता था कि पहले कौन सा गाना सुनाना है, फिर कौन सा गाना.”
‘सावन को आने दो' की सिटिंग में राजकमल ने सबसे पहले ‘चांद जैसे मुखड़े पे' सुनाया. उनके साथ ताराचंद बड़जात्या के दो-तीन असिस्टेंट भी मौजूद थे, जो गानों का क्रम नोट कर रहे थे. दिलचस्प बात यह है कि उस समय फिल्म का नाम भी ‘चांद जैसे मुखड़े पे' ही रखा गया था. इसके बाद ताराचंद बड़जात्या ने मशहूर लेखक राही मासूम रजा को बुलाया और राजकमल से कहा कि जिस क्रम में उन्होंने उन्हें गाने सुनाए हैं, उसी क्रम में राही मासूम रजा को भी सारे गाने सुनाए जाएं. राजकमल ने वैसा ही किया.
गाने के अनुसार कहानी
सूर्या राजकमल के मुताबिक, इसके बाद ताराचंद बड़जात्या ने राही मासूम रजा से कहा कि कहानी भी गानों के उसी क्रम के हिसाब से लिखी जाएगी. कोई भी गाना अपनी जगह से आगे-पीछे नहीं होगा. सूर्या राजकमल ने बताया, “ताराचंद जी ने कहा कि इसमें से जो पहला गाना है, वो फोर्थ नंबर पर नहीं आएगा. जो फोर्थ नंबर पर है, वो सेकंड नंबर पर नहीं आएगा. जिस सीक्वेंस में राजकमल जी ने मुझे गाने सुनाए हैं, उसी सीक्वेंस के हिसाब से आप कहानी लिखेंगे.”
बदला फिल्म का नाम
यानी ‘सावन को आने दो' की कहानी लिखने की प्रक्रिया में गानों का सीक्वेंस बेहद अहम था. पहले राजकमल ने गानों को एक तय क्रम में सुनाया और फिर उसी क्रम को बरकरार रखते हुए कहानी तैयार की गई. इस तरह फिल्म के गीत सिर्फ कहानी का हिस्सा नहीं रहे, बल्कि उनकी क्रमबद्धता ने कहानी के ढांचे को भी तय किया. बाद में फिल्म का नाम ‘चांद जैसे मुखड़े पे' से बदलकर ‘सावन को आने दो' कर दिया गया. लेकिन जिस गीत से फिल्म के सफर की शुरुआत हुई थी, वह आज भी इस फिल्म के सबसे यादगार गीतों में शामिल है.
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सावन के मौसम में जब ‘सावन को आने दो' के गीत सुनाई देते हैं, तो उनके पीछे की यह कहानी भी उतनी ही दिलचस्प लगती है एक ऐसी फिल्म, जिसकी कहानी और गीतों का रिश्ता शुरुआत से ही एक तय क्रम में जुड़ा हुआ था.
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