संगीत की दुनिया में कुछ गीत ऐसे होते हैं, जो समय और सीमाओं की बाधाओं को पार कर पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों के दिलों में बसे रहते हैं. ऐसा ही एक गीत है 'तूतक तूतक तूतिया'. शायद ही कोई भारतीय संगीत प्रेमी होगा जिसने इस गाने को कभी न सुना हो. शादी-ब्याह और पार्टियों सहित कई तरह के कार्यक्रमों में आज भी यह गीत लोगों को थिरकने पर मजबूर कर देता है. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस लोकप्रिय गीत की जड़ें 19वीं सदी के सिंध क्षेत्र से जुड़ी हुई हैं.
असल में सिंधी लोकगीत है 'हो जमालो'
'तूतक तूतक तूतिया' असल में सिंध का फेमस लोकगीत 'हे जमालो' है. यह गीत सिंधी संस्कृति में जीत, खुशी और उत्सव का प्रतीक माना जाता है. बाद में पंजाबी पॉप सिंगर मलकीत सिंह ने इसे मॉडर्न अंदाज में पेश किया, जिसके बाद यह दुनियाभर में फेमस हो गया. दिलचस्प बात यह है कि गीत में बार-बार सुनाई देने वाला "हो जमालो" किसी काल्पनिक शब्द का हिस्सा नहीं, बल्कि एक लोक गीत के नाम से जुड़ा माना जाता है.
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कौन था जमालो?
जमालो को लेकर कई लोककथाएं प्रचलित हैं. सबसे प्रसिद्ध कहानी के अनुसार, जमालो शीदी नाम का एक व्यक्ति ब्रिटिश शासन के दौरान सिंध क्षेत्र में रहता था. कहा जाता है कि अंग्रेजों ने एक रेलवे पुल का निर्माण कराया था, लेकिन उसकी मजबूती की जांच करने के लिए कोई भी व्यक्ति जान जोखिम में डालने को तैयार नहीं था. लोककथा के मुताबिक, जेल में बंद जमालो ने यह चुनौती स्वीकार की और सफलतापूर्वक पुल पर रेलगाड़ी चलाकर दिखा दी. उसकी बहादुरी से प्रभावित होकर उसकी सजा माफ कर दी गई. गांव लौटने पर लोगों ने उसकी जीत का जश्न मनाया और "हो जमालो" गाना शुरू किया.
दूसरी कहानी में कबीले का वीर योद्धा
एक दूसरी लोककथा के अनुसार, जमालो खोसो बलोच एक बहादुर योद्धा थे, जिन्होंने अपने कबीले और क्षेत्र की रक्षा के लिए कई लड़ाइयां लड़ीं. उनकी वीरता और विजय के सम्मान में महिलाओं ने "हो जमालो" गाकर उनका स्वागत किया. यही गीत धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र में पॉपुलर हो गया और बाद में लोकनृत्य का भी हिस्सा बन गया.
क्या है 'तूतक तूतक तूतिया' का मतलब?
"तूतक तूतक तूतिया" का कोई साफ शाब्दिक मतलब नहीं है. यह केवल एक रिदमिक म्यूजिक है, जिसे गीत को ज्यादा आकर्षक और नाचने योग्य बनाने के लिए जोड़ा गया था. मलकीत सिंह ने 1988 में जब इस गीत को पंजाबी भांगड़ा शैली में गाया, तब लिरिसिस्ट वीर रहीमपुरी ने इसमें "तूतक तूतक तूतिया" जैसी लाइन शामिल की थीं. इसके बाद यह गीत दुनियाभर में फेमस हो गया.
बॉलीवुड ने बढ़ाई लोकप्रियता
1989 की फिल्म 'घर का चिराग' से हिंदी सिनेमा में इस गाने को सबसे बड़ी पहचान मिली. फिल्म में चंकी पांडे और नीलम पर फिल्माए गए इस गाने को आशा भोसले और अमित कुमार ने अपनी आवाज दी थी. इसके बाद 2016 में फिल्म 'तूतक तूतक तूतिया' के टाइटल ट्रैक के तौर पर इसका नया वर्जन रिलीज हुआ, जिसे भी दर्शकों ने खूब पसंद किया. भले ही जमालो की असली पहचान को लेकर कोई ठोस ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन यह गीत आज भी बहादुरी, जीत और उत्सव का प्रतीक माना जाता है. यही वजह है कि सदियों पुराना यह लोकगीत आज भी लोगों की जुबान पर है और हर पीढ़ी को अपने सुरों से जोड़ता आ रहा है.
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