देश के बंटवारे की त्रासदी पर कई फिल्में बन चुकी हैं, लेकिन इस दौर की कहानियों में हमेशा एक ऐसा दर्द छिपा होता है जो पर्दे पर आते ही दर्शक को उस समय की भयावहता का एहसास करा सकता है. राजकुमार संतोषी की ‘बंटवारा 1947' भी बंटवारे के उसी दौर में इंसानियत, रिश्तों और मां की ममता की कहानी कहती है. फिल्म का विचार अच्छा है, कहानी में भावनात्मक संभावनाएं हैं और इसका संदेश भी मजबूत है. लेकिन इस अच्छी कहानी को पर्दे पर उतारने में निर्देशक कई जगह वह धार नहीं दिखा पाए, जिसकी उनसे उम्मीद की जाती है.
फिल्म की कहानी
फिल्म की कहानी देश के बंटवारे के दौरान की है. मिर्जा (सनी देओल) अपनी पत्नी (प्रीति जिंटा), बेटे जावेद (करण देओल) और बेटी के साथ मेरठ से पाकिस्तान के लाहौर चला आता है. उधर हिंदुस्तान में उसके भाई और परिवार की दंगाइयों द्वारा हत्या कर दी जाती है. लाहौर में मिर्जा को जो हवेली अलॉट होती है, वह एक हिंदू परिवार की है. हवेली की मालकिन (शबाना आजमी) इसे छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं, क्योंकि वह अपने बेटे, बहू और पोती के लौटने का इंतजार कर रही हैं. दूसरी तरफ मोहल्ले के लोग उन्हें लाहौर छोड़कर दिल्ली जाने के लिए मजबूर करना चाहते हैं.
यहीं से कहानी दो परिवारों और दो धर्मों के बीच रिश्तों की उस परत को सामने लाती है, जहां इंसानियत धर्म से बड़ी हो जाती है. फिल्म यह बात कहती है कि खून के रिश्तों और धर्म से बढ़कर दिल का रिश्ता होता है और मां की ममता किसी भी धर्म या मजहब से परे होती है. आगे क्या होता है, इसके लिए फिल्म देखनी होगी.
फिल्म की खूबियां
फिल्म की सबसे बड़ी खूबी इसकी कहानी और उसका संदेश है. बंटवारे की पृष्ठभूमि में इंसानियत और रिश्तों को केंद्र में रखकर कही गई कहानी में भावनात्मक असर पैदा करने की पूरी क्षमता है. फिल्म का क्लाइमेक्स बेहद असरदार है. इसकी टेकिंग भी अच्छी है और यह हिस्सा फिल्म के भावनात्मक पक्ष को मजबूती से सामने लाता है. क्लाइमेक्स कई दर्शकों की आंखें नम कर सकता है. फिल्म जहां भावनाओं को पकड़ पाती है, वहां उसका असर साफ नजर आता है.
दूसरा हाफ भी पहले हिस्से के मुकाबले बेहतर है. इस हिस्से में फिल्म की भावनात्मक पकड़ मजबूत होती है और कहानी दर्शक को अपने साथ जोड़ने लगती है. प्रीति जिंटा फिल्म में बहुत नैचुरल लगती हैं. खास बात यह है कि वह पंजाबी बोलने के दबाव के बावजूद अपने अभिनय पर उस भाषा का बोझ हावी नहीं होने देतीं. उनके किरदार में सहजता नजर आती है. करण देओल ठीक-ठाक हैं और अपने किरदार को संभाल लेते हैं.
शबाना आजमी अपने अभिनय से प्रभाव छोड़ती हैं, हालांकि उनके किरदार के पंजाबी संवाद कई जगह बनावटी सुनाई देते हैं. अली फजल की मौजूदगी भी प्रभावशाली है. उनका स्क्रीन टाइम भले ही कम है, लेकिन जब वह पर्दे पर आते हैं तो अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं.
ए. आर. रहमान का संगीत ठीक-ठाक है. वह फिल्म के भावनात्मक हिस्सों में साथ देता है, हालांकि संगीत फिल्म की बड़ी खूबी बनकर सामने नहीं आता. संतोष सिवन का छायांकन भी फिल्म के अच्छे पक्षों में शामिल है.
फिल्म की कमजोरियां
फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी पटकथा है. एक नाटक को स्क्रीनप्ले में बदलने की कोशिश पूरी तरह सफल नहीं लगती. कहानी में कई ऐसे मौके थे, जहां दृश्यों को ज्यादा प्रभावशाली बनाया जा सकता था, लेकिन फिल्म उन संभावनाओं का पूरा इस्तेमाल नहीं कर पाती. राजकुमार संतोषी के निर्देशन में इस बार वह धार नजर नहीं आती, जिसकी उनसे उम्मीद की जाती है. फिल्म का काफी हिस्सा ऐसा लगता है जैसे उसे नाटक की तरह ब्लॉकिंग के साथ शूट कर दिया गया हो. किरदार कई जगह अपनी जगह पर खड़े होकर संवाद बोलते नजर आते हैं और सिनेमाई विस्तार की कमी महसूस होती है.
एडिटिंग भी फिल्म की कमजोर कड़ियों में है. कई जगह एडिटिंग जर्की महसूस होती है. कुछ शॉट सिर्फ कहानी को आगे बढ़ाने के लिए फ्लैश की तरह आते हैं. इनका कोई खास भावनात्मक असर नहीं होता और वे दर्शक को एक तरह का झटका देकर आगे निकल जाते हैं. ऐसे शॉट कहानी की गति तो बढ़ाते हैं, लेकिन भावनाओं से जुड़ने का मौका नहीं देते.
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फिल्म में पंजाबी बोलने की कोशिश भी कई कलाकारों के लिए परेशानी बनती है. अभिमन्यु सिंह पंजाबी बोलते हुए कई जगह नकली लगते हैं. शबाना आजमी के पंजाबी संवाद भी पूरी तरह सहज नहीं लगते. भाषा की यह असहजता कुछ दृश्यों के भावनात्मक असर को कम करती है. कुछ दृश्यों में कहानी में भावनात्मक रूप से बहुत कुछ करने की गुंजाइश थी, लेकिन निर्देशक उन्हें उस स्तर तक नहीं ले जा पाए. यही वजह है कि फिल्म की अच्छी कहानी होने के बावजूद कई हिस्से उतना असर नहीं छोड़ते, जितना छोड़ सकते थे.
सनी देओल जहां अपने रंग में आते हैं, वहां असर छोड़ते हैं. लेकिन जो दर्शक उन्हें ‘गदर' वाले सनी देओल के रूप में देखने की उम्मीद लेकर जाएंगे, उन्हें सनी देओल का यह रूप शायद थोड़ा सा फीका लग सकता है.
फैसला
‘बंटवारा 1947' की कहानी अच्छी है और उसका संदेश भी महत्वपूर्ण है. अगर कहानी की भावनात्मक क्षमता को मजबूत स्क्रीनप्ले और ज्यादा प्रभावशाली निर्देशन का साथ मिलता, तो ‘बंटवारा 1947' कहीं ज्यादा असरदार फिल्म बन सकती थी.
कलाकार: सनी देओल, करण देओल, प्रीति जिंटा, शबाना आजमी, अभिमन्यु सिंह, अली फजल
निर्देशक: राजकुमार संतोषी
कहानी: असगर वजाहत, राजकुमार संतोषी
संगीत: ए. आर. रहमान
छायांकन: संतोष सिवन
रेटिंग: ⭐⭐⭐
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