20 अगस्त के दिन 50 साल पहले एक फिल्म रिलीज हुई थी. अगर इस फिल्म में अनिल कपूर को काम मिल जाता तो उनका दमदार डेब्यू 1981 के बजाट पांच साल पहले 1976 में ही हो जाता. लेकिन उनके लुक की वजह से ऐसा नहीं हो पाया क्योंकि डायरेक्टर को थोड़ा यंग दिखने वाला एक्टर चाहिए था. इस तरह ये बाजी शोले का अहमद मार ले गया. फिल्म के गाने सुपरहिट हुए और ये हिंदी सिनेमा की यादगार फिल्मों में शामिल हो गई है. हम बात कर रहे हैं 1976 में रिलीज हुई हिंदी फिल्म 'बालिका वधू' आज भी भारतीय सिनेमा के उन यादगार चित्रों में शुमार है, जिन्होंने बाल विवाह और किशोर प्रेम की संवेदनशील कहानी को बड़ी खूबसूरती से पेश किया. 50 साल बाद भी फिल्म को उसके विषय के लिए याद किया जाता है लेकिन इसका गाना तो आज भी पहचान है.
50 साल पहले का अनिल कपूर का वो किस्सा
'बालिका वधू' का निर्देशन तरुण मजूमदार ने किया था. इस फिल्म का सबसे चर्चित किस्सा अनिल कपूर से जुड़ा है. आईएमडीबही के मुताबिक उस समय अनिल कपूर फिल्म इंडस्ट्री में अपना स्थान बनाने की कोशिश कर रहे थे. उन्होंने बालिका वधू में सचिन पिलगांवकर के किरदार के लिए ऑडिशन दिया था. अनिल कपूर ऑडिशन के लिए धोती-कुर्ता पहनकर पहुंचे थे, ताकि वे एक साधारण गांव के लड़के जैसे लगें. लेकिन निर्देशक तरुण मजूमदार को लगा कि अनिल कपूर उस युवा स्कूल बॉय के किरदार के लिए काफी उम्रदराज दिख रहे हैं. नतीजतन उन्हें रोल नहीं मिला और शोले के अहमद यानी सचिन को यह किरदार मिला, जिन्होंने बाद में फिल्म में बेहतरीन अभिनय किया.
यादगार है बालिका वधू का म्यूजिक
फिल्म का संगीत भी उतना ही यादगार रहा. गीत 'बड़े अच्छे लगते हैं' अमित कुमार की आवाज में रिकॉर्ड किया गया था. यह गीत अमित कुमार का पहला बड़ा हिट साबित हुआ. ये गाना इतना लोकप्रिय हुआ कि 1977 की बिनाका गीतमाला की वार्षिक सूची में जगह बनाने में सफल रहा. इस गीत ने फिल्म को और अधिक लोकप्रियता दिलाई.
बंगाली फिल्म का थी रीमेक
बालिका वधू असल में बंगाली फिल्म की रीमेक थी. 1967 में तरुण मजूमदार ने ही बंगाली में बालिका वधू बनाई थी, जिसमें मौसमी चटर्जी मुख्य भूमिका में थीं. हिंदी वर्जन में भी मजूमदार ने निर्देशन का जिम्मा संभाला और मूल कहानी को हिंदी दर्शकों के लिए पेश किया. दोनों फिल्मों में निर्देशक एक ही होने के कारण कहानी की संवेदनशीलता और भावनात्मक गहराई बनी रही.
बांग्ला उपन्यास पर आधारित थी फिल्म
फिल्म की कहानी प्रसिद्ध बंगाली उपन्यासकार बिमल कर के उपन्यास 'बालिका वधू' पर आधारित है. उपन्यास में बाल विवाह और दो किशोरों के बीच धीरे-धीरे पनपते रिश्ते को बहुत ही संजीदगी से दिखाया गया था. तरुण मजूमदार ने इस कहानी को पर्दे पर उतारते हुए न सिर्फ उपन्यास की आत्मा को बचाए रखा, बल्कि उसे सिनेमाई रूप भी दिया.
बालिका वधू सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि उस दौर की सामाजिक संवेदनाओं का आईना है. तरुण मजूमदार की संवेदनशील निर्देशन शैली, बिमल कर की कहानी और यादगार संगीत ने मिलकर इसे कालजयी बना दिया.
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