हिंदी सिनेमा के शुरुआती दौर में जब केएल सहगल की आवाज का जादू हर तरफ छाया हुआ था, उसी समय पंजाब से एक ऐसा कलाकार मुंबई पहुंचा, जिसने अपनी अलग पहचान बनाई. दिलचस्प बात यह थी कि फिल्मों में आने से पहले वह वकील थे. पढ़ाई पूरी कर चुके इस शख्स के भीतर मगर संगीत के लिए खास जुनून था. दोस्त की सलाह ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी और उन्होंने कानून की जगह गायिकी को अपना भविष्य बनाने का फैसला किया.
वकील की पढ़ाई छोड़ मुंबई पहुंचे
11 सितंबर 1910 को पंजाब के बटाला गांव में जन्मे सुरेंद्र नाथ शर्मा यानी सुरेंद्र ने बीए और एलएलबी की पढ़ाई की थी. उनका करियर वकालत की ओर बढ़ रहा था, लेकिन संगीत के प्रति लगाव बचपन से ही था. दोस्त ने जब उन्हें इसी हुनर को पेशा बनाने की सलाह दी तो सुरेंद्र मुंबई आ गए. उन दिनों फिल्म इंडस्ट्री में नए कलाकार के लिए जगह बनाना आसान नहीं था. उनकी किस्मत तब बदली जब मशहूर फिल्मकार महबूब खान ने उनकी आवाज सुनी. सुरेंद्र की गायकी से प्रभावित होकर उन्होंने उन्हें फिल्मों में मौका दिया और अभिनेता-सिंगर के रूप में आगे बढ़ाया.
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पहले ही दौर में मिल गया बड़ा मौका
सुरेंद्र ने 1936 में रिलीज हुई ‘डेक्कन क्वीन' से फिल्मी सफर शुरू किया. उनकी आवाज में एक अलग मिठास थी और यही वजह थी कि उन्हें केएल सहगल के संभावित विकल्प के तौर पर भी देखा जाने लगा. सुरेंद्र ने सहगल के लोकप्रिय गीत ‘बालम आए…' की पैरोडी ‘बिरहा की आग लगी…' के रूप में गाई. यह गीत लोगों को खूब पसंद आया और देखते ही देखते उनका नाम संगीत प्रेमियों तक पहुंच गया. इसके बाद उन्होंने कई यादगार गीत दिए, जिनमें ‘तुम्हीं ने मुझको प्रेम सिखाया', ‘भंवर मधुबन में जा', ‘भिक्षा दे दे मां' और ‘प्रेम बिना सब सूना' जैसे गीत शामिल थे.
नूरजहां के साथ बनी आवाजों की खास जोड़ी
सुरेंद्र की गायकी को सबसे ज्यादा याद किया जाता है उनकी और नूरजहां की जोड़ी के लिए. दोनों की आवाजों का मेल श्रोताओं को बेहद पसंद आया. ‘आवाज दे कहां है' आज भी पुराने हिंदी फिल्म संगीत के यादगार गीतों में गिना जाता है. इसके अलावा ‘क्यूं याद आ रहे हैं गुजरे हुए जमाने' और ‘अब कौन है मेरा' जैसे गीत भी चर्चित हुए. उनका ‘तेरी याद का दीपक जलता है दिन रात' भी आज तक संगीत प्रेमियों के बीच अपनी जगह बनाए हुए है.
‘मदर इंडिया' से भी जुड़ा था खास रिश्ता
सुरेंद्र सिर्फ गायक नहीं, बल्कि अभिनेता भी थे. उन्होंने कई फिल्मों में अभिनय किया और ‘मुगल-ए-आजम', ‘दिल देके देखो' और ‘रानी रूपमती' जैसी फिल्मों का हिस्सा रहे. सबसे दिलचस्प बात यह है कि 1957 की मशहूर ‘मदर इंडिया' की कहानी की जड़ें महबूब खान की 1940 की फिल्म ‘औरत' से जुड़ी थीं, जिसमें सुरेंद्र ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. इस तरह सुरेंद्र का नाम हिंदी सिनेमा के उस दौर से जुड़ गया, जिसने आगे चलकर फिल्म संगीत और अभिनय दोनों की मजबूत नींव रखी.
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