राम और सीता की कहानी पर हिंदी सिनेमा में कई गाने लिखे गए. लेकिन एक गीत ऐसा भी है जिसने धार्मिक कथा नहीं, बल्कि एक बेबस और ठुकराई हुई महिला के दर्द को सीता की पीड़ा से जोड़ दिया. यही वजह है कि ये गाना आज भी सुनने वालों के दिल को चीर देता है. 1960 में रिलीज हुई एक फिल्म में शामिल इस गीत ने उस दौर में लाखों लोगों को इमोशनल कर दिया था. मोहम्मद रफी की दर्द भरी आवाज, जज्बातों से भरे लिरिक्स और गहरे इमोशन्स इसे आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार गीतों में शामिल करती हैं.
'गली गली सीता रोए' ने बयां किया बंटवारे का दर्द
हम बात कर रहे हैं 'गली गली सीता रोए' गीत की ये गाना 1960 में रिलीज हुई फिल्म 'छलिया' में आया था. इस गीत को मोहम्मद रफी ने गाया था. जबकि इसके बोल कमर जलालाबादी ने लिखे और संगीत कल्याणजी-आनंदजी ने तैयार किया. पहली नजर में ये गाना रामायण की सीता का दर्द सुनाता हुआ लगता है. लेकिन असल में इसके पीछे भारत-पाकिस्तान बंटवारे का दर्द छिपा है. फिल्म की कहानी एक ऐसी महिला की है. जो बंटवारे के दौरान अपने परिवार से बिछड़ जाती है. कई साल बाद जब वो लौटती है तो उसका अपना पति और समाज उसे अपनाने से इनकार कर देता है. ऐसे में गीत के जरिए उसकी तुलना सीता से की जाती है जिसने बिना किसी गलती के अग्निपरीक्षा और समाज के सवाल झेले थे.
राज कपूर-नूतन की फिल्म का सबसे इमोशनल सॉन्ग
'छलिया' का डायरेक्शन मशहूर फिल्मकार मनमोहन देसाई ने किया था. फिल्म में राज कपूर, नूतन, प्राण, रहमान और शोभना समर्थ जैसे दिग्गज कलाकार नजर आए थे. फिल्म की कहानी रूसी लेखक फ्योदोर दोस्तोयेव्स्की की कहानी व्हाइट नाइट्स से इंस्पायर मानी जाती है. लेकिन इसे भारत के बंटवारे के दर्द के साथ जोड़ा गया. फिल्म में ये गाना सिर्फ एक गाना नहीं, बल्कि पूरी कहानी की आत्मा बनकर सामने आता है. जब शांति का किरदार समाज की बेरुखी और अपनों की बेरूखी झेलता है, तब 'गली गली सीता रोए' उसकी बेबसी को आवाज देता है. मोहम्मद रफी की इमोशनल गायकी इस दर्द को और गहरा बना देती है.
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