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66 साल पुराना जन्माष्टमी का वो गाना जिसमें अकबर के दरबार में मना कृष्ण जन्मोत्सव, मधुबाला-लता मंगेशकर की जुगलबंदी ने बनाया सदाबहार

66 साल पुराना जन्माष्टमी का वो गाना जिसे नौशाद के म्यूजिक ने बनाया अमर, लता मंगेशकर की आवाज ने बनाया सदाबहार. मधुबाला के इस गाने के बिना अधूरा सा लगता है कृष्ण जन्मोत्सव.

66 साल पुराना जन्माष्टमी का वो गाना जिसमें अकबर के दरबार में मना कृष्ण जन्मोत्सव, मधुबाला-लता मंगेशकर की जुगलबंदी ने बनाया सदाबहार
66 साल पुराना जन्माष्टमी का वो गाना जिसके बिना अधूरा है कृष्ण जन्मोत्सव
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नई दिल्ली:

1960 में रिलीज हुई के. आसिफ की फिल्म 'मुगल-ए-आजम' न सिर्फ भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा ऐतिहासिक प्रेम-प्रसंग है, बल्कि उसके संगीत ने भी इतिहास रच दिया. इसी फिल्म का एक ऐसा भी गाना है जिसे बनाते समय कई तरह के तर्क दिए गए, कई बहस हुई और फिल्म में इसके औचित्य को लेकर भी कई तरह की बातें हुईं. लेकिन जब इस गाने को फिल्म में पिरोया गया और ये फिल्म रिलीज हुई तो ये हिंदी सिनेमा का कल्ट सॉन्ग बन गया और जन्माष्टमी के मौके पर इसका सुना जाना तो लाजिमी है.

हम बात कर रहे हैं 'मुगल-ए-आजम' फिल्म के 'मोहे पंघाट पे नंदलाल छेड़ गयो रे' गाने की. यह गीत अनारकली (मधुबाला) को राधा के रूप में पेश करता है और अकबर के दरबार में कृष्ण जन्मोत्सव की पूरी झांकी पेस करता है. 

नौशाद का जादू, लता की आवाज, लच्छू महाराज की कोरियोग्राफी

'मोहे पंघाट पे नंदलाल छेड़ गयो रे' गाने के संगीतकार नौशाद थे. उन्होंने इस गीत को शास्त्रीय ठुमरी शैली में कंपोज किया. लता मंगेशकर का गाया गया यह गीत कोरस के साथ और भी मारक बन जाता है. कोरियोग्राफी कथक के महान गुरु लच्छू महाराज ने की थी. गीत को टेक्नीकलर में शूट किया गया था, जो उस समय की बड़ी तकनीकी उपलब्धि थी. मधुबाला की नजाकत, उनकी आंखों का जादू और डांस ने इस गीत को अमर बना दिया.

गाने को लेकर क्यों हुई थी आपत्ति

दिलचस्प बात यह है कि शुरू में इस गीत को लेकर आपत्ति भी उठी थी. शूटिंग के दौरान कुछ लोगों को लगा कि मुगल बादशाह अकबर को जन्माष्टमी जैसे हिंदू त्योहार के माहौल में दिखाना फिल्म के लिए सही नहीं होगा. लेकिन नौशाद ने जोधा बाई की उपस्थिति का तर्क देकर इसे जायज ठहराया और सीन को समझाने वाले संवाद जोड़ दिए. नतीजतन यह सीक्वेंस फिल्म का सबसे यादगार हिस्सा बन गया.

गीतकार को लेकर भी विवाद

गीतकार को लेकर भी लंबे समय तक विवाद रहा. मूल फिल्म में इसे शकील बदायूनी के नाम पर क्रेडिट किया गया था. लेकिन वास्तव में यह गीत 1920 में गुजराती नाटक 'छत्र विजय' के लिए रघुनाथ ब्रह्मभट्ट ने लिखा था. बाद में जब मामला सामने आया तो ब्रह्मभट्ट को रॉयल्टी मिली और 2004 में रंगीन वर्जन के रिलीज के समय उन्हें आधिकारिक रूप से गीतकार का क्रेडिट दे दिया गया.

'मुगल-ए-आजम' की कहानी प्रेम, सत्ता और बलिदान की है, और यह गीत उस कहानी की शुरुआत को काव्यात्मक बनाता है. छह दशक बाद भी यह गीत उतना ही ताजा और असरदार है जितना 1960 में था, यही इसकी सबसे बड़ी कामयाबी भी है.

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