भारत के कॉमिक इतिहास के सबसे प्यारे और चतुर कैरेक्टर चाचा चौधरी को 55 साल पूरे हो चुके हैं. 1971 में हिंदी पत्रिका ‘लोटपोट' में पहली बार छपे इस कैरेक्टर ने पीढ़ियों को जोड़ दिया. लाल पगड़ी, सफेद मूंछें, लकड़ी की छड़ी और जेब में बादाम, यह इमेज इतनी गहरी बैठ गई कि बिना चाचा के संडे अधूरा लगता था. अब आप कहेंगे चाचा का संडे से क्या लेना? तो 80 के दशक में संडे के दिन दोपहर को विविध भारती रेडियो पर दोपहर दो बजे डायमंड कॉमिक्स का 15 मिनट का शो आता था. जिसमें लेटेस्ट कॉमिक्स की जानकारी मिलती थी और कहानियां सुनाई जाती थीं. तो हम बच्चों को उस समय ना सिर्फ आने वाली कॉमिक्स के बारे में जानकारी मिलती बल्कि कुछ अधूरी कहानियां भी सुनने को मिल जातीं.
ऐसे हुआ था चाचा चौधरी का जन्म
चाचा चौधरी के कैरेक्टर को कार्टूनिस्ट प्राण (प्राण कुमार शर्मा) ने क्रिएट किया था. 15 अगस्त 1938 को कसूर (अब पाकिस्तान) में जन्मे प्राण को बाद में 'भारत का वॉल्ट डिज्नी' कहा गया. चाचा चौधरी के कैरेक्टर को तैयार करने के लिए उन्होंने चाणक्य और गांव के समझदार बुजुर्ग से प्रेरणा ली. नतीजा निकला एक ऐसा नायक जो ना सुपरमैन जैसा उड़ता था, न कोई जादुई गैजेट रखता था. उसकी ताकत सिर्फ दिमाग थी. तभी तो ये लाइन आज भी फेमस है, 'चाचा चौधरी का दिमाग कंप्यूटर से भी तेज चलता है.' प्राण का निधन 6 अगस्त 2014 को हुआ. उन्हें मरणोपरांत पद्मश्री मिला.
चाचा, साबू और रॉकेट की जोड़ी
चाचा के साथ सबसे यादगार जोड़ी साबू की थी. ज्यूपिटर ग्रह का यह लंबा-चौड़ा दोस्त जब धरती पर आया तो चाची के खाने का स्वाद चखकर यहीं रुक गया. बच्चे साबू जैसी ताकत चाहते थे. वह पहाड़ों को हिला देता, दुश्मनों को उछाल देता, फिर भी चाचा की एक बात पर रुक जाता. परिवार में तीखे स्वभाव वाली चाची बीनी और वफादार कुत्ता रॉकेट भी हरदिलअजीज थे. ये सब मिलकर अचरजगंज के छोटे-बड़े संकट सुलझाते थे, चोर, भ्रष्ट अफसर, ठग और कभी-कभी एलियन तक.
डायमंड कॉमिक्स ने इस सीरीज को देशभर में पहुंचाया. हिंदी-अंग्रेजी समेत दस से अधिक भाषाओं में इस कॉमिक्स की जबरदस्त डिमांड रही. रेलवे स्टेशन से लेकर बस अड्डों तक दुकानों पर ये कॉमिक्स छाई रहतीं. 1980-90 के दौर में संडे का मतलब चाचा चौधरी को सुनना और पढ़ना हुआ खरता था.
चाचा का टीवी से ओटीटी तक का सफर
2002 में ये किरदार छोटे पर्दे पर आया. 13 मई को सहारा वन पर लाइव-एक्शन शो शुरू हुआ. रघुबीर यादव ने चाचा का रोल निभाया, प्रवीण कुमार साबू बने. दो सीजन और करीब 415 एपिसोड आए. बच्चों के बीच यह शो खूब पसंद किया गया. बाद में 2019 में टून्ज एनिमेशन ने कार्टून सीरीज बनाई. अब वही एनिमेटेड कहानियां जियोहॉटस्टार और यूट्यूब के जियोहॉटस्टार किड्स चैनल पर उपलब्ध हैं. चाचा, साबू और रॉकेट आज भी नए एपिसोड और पुरानी कहानियों के साथ बच्चों को लुभा रहे हैं.
55 साल बाद भी चाचा चौधरी इसलिए टिके हैं क्योंकि वे आम भारतीय परिवार से जुड़े थे. मध्यमवर्गीय बुजुर्ग, जो जुगाड़ से काम निकालता है, नैतिक सबक देता है और हंसाता भी है.
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