कास्टिंग डायरेक्टर और फिल्ममेकर मुकेश छाबड़ा के लिए थिएटर सिर्फ कला का माध्यम नहीं, बल्कि उनकी जिंदगी का अहम हिस्सा है. फिल्मों ने उन्हें लोकप्रियता दी, लेकिन रंगमंच आज भी उनके जुनून और सुकून की वजह है. 15 से 17 अक्टूबर तक आयोजित ‘खिड़कियां थिएटर फेस्टिवल' के जरिए उन्होंने नए कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर दिया. छाबड़ा कहते हैं, “फिल्मों ने मुझे लोकप्रियता दी है, लेकिन थिएटर मुझे जिंदा रखता है.” उनके लिए यह फेस्टिवल रंगमंच से अपने जुड़ाव को बनाए रखने और नई प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने का जरिया है.
लाइव ऑडिशन और बड़ी संख्या में पहुंचे दर्शक
इस बार फेस्टिवल में लाइव ऑडिशन की शुरुआत की गई. ऑनलाइन और ऑफलाइन भागीदारी के विकल्पों के साथ दूसरे शहरों के कलाकारों को भी अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिला. मुकेश छाबड़ा के मुताबिक, फेस्टिवल में रोजाना करीब 7,000 से 8,000 दर्शक पहुंचे, जबकि प्रतिदिन 300 से 400 कलाकारों ने ऑडिशन दिया.
इस संस्करण में तीन नाटकों का मंचन किया गया और हर नाटक के दो शो हुए. प्रस्तुतियों में हिस्सा लेने वाले कलाकारों को दो महीने की वर्कशॉप के दौरान प्रशिक्षण देने के बाद चुना गया.
सितारों का साथ, बिना किसी व्यावसायिक मकसद के
जयदीप अहलावत, नवाजुद्दीन सिद्दीकी और फराह खान जैसे फिल्मी सितारे भी फेस्टिवल का हिस्सा बने. छाबड़ा के मुताबिक, “वे यहां प्यार की वजह से आते हैं. यही इस फेस्टिवल की सबसे खूबसूरत बात है.”
वह बताते हैं कि कई कलाकारों ने उनसे कहा है कि जब तक वह इस आयोजन को जारी रखेंगे, वे इसका समर्थन करते रहेंगे. फेस्टिवल में प्रवेश पूरी तरह मुफ्त है और इसका कोई व्यावसायिक मकसद नहीं है.
आयोजन के खर्च के बारे में छाबड़ा कहते हैं कि वह अपनी जेब से पैसा लगाते हैं. फिल्म इंडस्ट्री के लोग भी अलग-अलग स्तर पर सहयोग करते हैं. उनकी कोशिश है कि आने वाले संस्करणों में फेस्टिवल का विस्तार हो और ज्यादा कलाकारों को मंच मिल सके.
कलाकारों के लिए अनुभव ही सबसे बड़ा पुरस्कार
फेस्टिवल में कलाकारों के लिए कोई औपचारिक पुरस्कार नहीं रखा गया है. छाबड़ा का मानना है कि बड़ी संख्या में दर्शकों के सामने प्रस्तुति देने का अवसर ही उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान है.
“अनुभव ही इनाम है. इतने सारे लोगों के सामने परफॉर्म करने का मौका मिलना किसी भी कलाकार के लिए सबसे बड़ा पुरस्कार है,” वह कहते हैं.
15 से 17 अक्टूबर तक चले ‘खिड़कियां थिएटर फेस्टिवल' में दर्शकों की भागीदारी, लाइव ऑडिशन और फिल्मी सितारों के समर्थन ने रंगमंच के प्रति मुकेश छाबड़ा के जुनून को सामने रखा. फिल्मों से मिली शोहरत के बावजूद थिएटर से उनका जुड़ाव बरकरार है और इस आयोजन के जरिए वह नए कलाकारों को अपनी पहचान बनाने का अवसर देना चाहते हैं.
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