लता मंगेशकर को स्वर सम्राज्ञी माना जाता है, लेकिन सुरों की इस मलिका को मौसिकी की ये नेमत ऐसे ही हासिल नहीं हुई थी. इसके पीछे उतनी ही मेहनत और लगन की कई कहानियां छिपी हैं. एक ऐसा ही किस्सा फिल्म 'अमर' के एक गाने की रिकॉर्डिंग से जुड़ा है. उस दिन लता मंगेशकर को एक ही गाना बार-बार गाना पड़ा, लेकिन संगीतकार नौशाद हर बार रिकॉर्डिंग रोक देते. उन्हें गाने में एक खास बारीकी चाहिए थी और लता जी लगातार कोशिश करती रहीं. छोटे और बंद स्टूडियो में गर्मी भी काफी थी. बताया जाता है कि करीब 17 रिटेक के बाद लता मंगेशकर इतनी थक गईं कि उनकी तबीयत बिगड़ गई और उन्हें चक्कर आने लगे.
फिल्म 'अमर' के लिए रिकॉर्ड हो रहा था यह गाना
यह किस्सा 1954 में रिलीज हुई फिल्म 'अमर' से जुड़ा है. महबूब खान के निर्देशन में बनी इस फिल्म में दिलीप कुमार और मधुबाला मुख्य भूमिकाओं में थे. फिल्म के गानों का संगीत नौशाद ने तैयार किया था. जिस गाने की रिकॉर्डिंग के दौरान यह सब हुआ, वह था 'तेरे सदके बलम, न कर कोई गम'. इसके बोल शकील बदायूंनी ने लिखे थे और इसे लता मंगेशकर ने अपनी आवाज दी थी. यह गाना मधुबाला पर फिल्माया गया था.
एक शब्द की बारीकी पर बार-बार रुक रही थी रिकॉर्डिंग
कहा जाता है कि लता मंगेशकर गाना रिकॉर्ड करतीं, लेकिन नौशाद बीच में उन्हें रोक देते. उन्हें एक खास शब्द को गाने के तरीके में वह बात नहीं मिल रही थी, जिसकी उन्हें तलाश थी. नौशाद खासतौर पर 'ऐ' शब्द को थोड़ा अलग ढंग से खींचने के लिए कहते थे. कभी लता जी उसे ज्यादा खींच देतीं तो कभी नौशाद किसी और बारीकी को लेकर संतुष्ट नहीं होते. इस तरह गाने की रिकॉर्डिंग बार-बार शुरू होती और फिर रुक जाती.
लगातार 17 रिटेक के बाद चक्कर आने लगे
उस दौर के रिकॉर्डिंग स्टूडियो आज जैसे आरामदायक नहीं थे. बताया जाता है कि जिस कमरे में रिकॉर्डिंग हो रही थी, वहां न पंखा था और न एसी. कमरा भी छोटा और बंद था. लगातार गाते रहने के कारण लता मंगेशकर पसीने से तर हो चुकी थीं. कहा जाता है कि गाने के करीब 17 रिटेक हुए. लगातार कोशिश करते-करते लता जी बुरी तरह थक गईं. आखिर में उनकी तबीयत बिगड़ गई, उन्हें चक्कर आने लगे और वह कुर्सी पर बैठ गईं.
फिल्म के 10 में से 7 गाने लता जी ने गाए थे
फिल्म 'अमर' के संगीत में लता मंगेशकर की आवाज का बड़ा योगदान था. फिल्म के 10 गानों में से 7 गाने उन्होंने गाए थे और 'तेरे सदके बलम, न कर कोई गम' सबसे हिट गानों में शामिल रहा. यह किस्सा उस दौर की रिकॉर्डिंग की मेहनत और संगीतकारों की बारीकी, दोनों को दिखाता है. एक तरफ नौशाद अपनी पसंद के मुताबिक गाने की रिकॉर्डिंग चाहते थे, तो दूसरी तरफ लता मंगेशकर लगातार कोशिश करती रहीं. शायद इसी मेहनत और लगन ने उनके गाए गीतों को आज भी लोगों की यादों में जिंदा रखा है.
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